
टोंक. राजमहल. जिले के ग्रामीण मजबूरी में गला तर कर रहे हैं। अधिकतर गांवों के लोग फ्लोराइडयुक्त पानी पीने को मजबूर है। मीठे पानी के लिए उन्हें कई किलोमीटर दूर का सफर करना पड़ रहा है तथा खरीद करना पड़ रहा है।
जलदाय विभाग की ओर से कई सालों पहले फ्लोराइडयुक्त पानी से राहत देने के लिए जिले में लगाए गए डी-फ्लोरोनेशन यूनिट भी कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। ऐसे में जिले के 500 गांवों के लोग फ्लोराइडयुक्त पानी पी रहे हैं।
विभाग की प्रयोगशाला की ओर से लिए गए नमूनों की जांच के अनुसार जिले के कई गांवों में तो फ्लोराइड की मात्रा इतनी अधिक है कि उसे पिया नहीं जा सकता। जो पीते हैं उनकी कमर झुक गई तथा हड्डियां मुड़ गई।
कई गांवों में मीठे पानी की आपूर्ति अन्य गांवों से होती है। प्रयोगशाला की ओर से किए गए सर्वे के अनुसार जिले में मीठे पानी के स्रोत कम है। गांवों के कुएं, हैण्डपम्प तथा बोरवैल का पानी फ्लोराइडयुक्त है।
इस पानी से ना तो सिंचाई होती और ना ही मकान निर्माण किया जा सकता। प्रशासन चाहे तो इन गांवों में मीठे पानी की आपूर्ति बीसलपुर बांध से करा सकता है, लेकिन ऐसी योजना जिला प्रशासन ने अभी तक तैयार नहीं की।
टोंक-देवली-उनियारा के लिए प्रस्तावित बीसलपुर पेयजल योजना भी वर्तमान में निर्माणाधीन है। इसके चलते फ्लोराइडयुक्त पानी वाले गांवों के लोग मीठे पानी को तरस रहे हैं। जल संसाधन विभाग के मुताबिक गहराई वाले जलाशयों के पानी में फ्लोारइड की मात्रा अधिक मानी गई है।
जांच में हो रहा फ्लोराइड का खुलासा
राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल गुणवत्ता कार्यक्रम के तहत शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पानी की जांच की जा रही है। प्रदेश के 20 जिलों में सचल जल परीक्षण प्रयोगशाला की सुविधा मुहैया कराई जा रही है।
यह प्रयोगशाला गांव-गांव, ढाणी-ढाणी पहुंचकर हैण्डपम्पों व ट्यूबवैल के साथ ही जलदाय विभाग की टंकियों व सार्वजनिक कुओं से पानी के नमूने लेकर मौके पर ही जांच कर रही है।
सचल जल प्रयोगशाला की बस शनिवार को क्षेत्र के बोटून्दा गांव पहुंची। जहां सार्वजनिक जलस्रोतों से पानी के नमूने लेकर जांच की गई।
प्रयोगशाला के लैब केमिस्ट संजय तिवाड़ी ने बताया कि अब तक जिले की कंवारावास, बोटून्दा, बस्सी, भांसू, थड़ोली, पचेवर, पारली सहित बीस पंचायतों के दर्जनों गांव व ढाणियों में 400 नमूने लेकर जांच की जा चुकी है।
इसकी ऑनलाइन रिपोर्ट जयपुर स्थित जलदाय विभाग के मुख्यालय व उसके बाद केन्द्र सरकार को भिजवाई जाएगी। अब तक जांच के दौरान कई गांव व ढाणियों में गहराते जल के चलते फ्लोराइडयुक्त पानी की मात्रा कहीं कम तो कहीं अधिक आई है।
प्रयोगशाला वैन में सम्पूर्ण मशीनरी के साथ में होने से गांव के जलस्रोतों के पानी में व्याप्त जिवाणुओं के साथ ही सात पैरामीटर पीएच, क्षारियता, कठोरता, क्लोराइड, फ्लोराइड, नाइट्रेट, टीडीएस सहित जलदाय विभाग की ओर से की जा रही जलापूर्ति के अवशेष क्लोरिन आदि की जांच की जा रही है। गांवों में जलस्रोतों के करीब गंदगी व कीचड़ को लेकर सेनेट्री सर्वे भी साथ में किया जा रहा है।
ये हैं पानी के मानक
प्रयोगशाला सूत्रों के मुताबिक पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिकतम 1.5 पीपीएम (पाटर्स पर मिलीयन) होना चाहिए। इससे अधिक मात्रा होने पर पानी शरीर को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है।
जबकि देवली क्षेत्र के सांवतगढ़, कासीर, पोल्याड़ा, मालेड़ा, मालपुरा क्षेत्र का आंटोली, आवड़ा, कुरथल, किशनपुरा, देशमा, लावा, नगर, पारली, टोडारायसिंह में भांवता, टोंक संदेड़ा, लवादर का फरुखाबाद, पीपलू में बगड़ी, रिंडल्या बुजुर्ग, सिंधोलिया, निवाई में चनानी का श्रीकृपालपुरा, चतुर्भुजपुरा, बड़ागांव, बिडोली, उनियारा में ककोड़ के रामपुरा, पायगा, रानीपुरा, रूपपुरा, रूपवास आदि के हैण्डपम्पों में फ्लोराइड की मात्रा 5 पीपीएम से अधिक है।
यह है जिले के ब्लॉक की स्थिति
ब्लॉक गांवों की संख्या
देवली 119
मालपुरा 50
निवाई 193
टोडारायसिंह 20
टोंक 64
उनियारा 119
हर गांव में होगी जांच
सचल जल परिक्षण प्रयोगशाला हर गांव में पानी की जांच करेगी। कई गांवों में जांच की जा चुकी है। सभी नमूनों का क्रोस टेस्टिंग भी किया जा रहा है। जल परिक्षण प्रयोगशाला की रिपोर्ट जिला लैब में भी है।
संजीव कुमार मीणा, कनिष्ठ रसायनज्ञ जिला लैब पीएचईडी टोंक