उदयपुर

7 समंदर पार से17 शवों को वतन लेकर लौटा ये ‘धरती का लाल

उदयपुर के किसान पुत्र ने की अनूठी पहल
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7 समंदर पार से17 शवों को वतन लेकर लौटा ये 'धरती का लाल

उदयपुर. मेनार/ उमेश मेनारिया
जन्म और मृत्यु इस संसार की सत्यता है। अनहोनी को कोई नहीं टाल सकता। किसकी कब और कहां पर मौत लिखी है। यह भी कोई नहीं जानता, लेकिन जिंदगी कई बार ऐसे पल दिखाती है कि मरने के बाद अपने का शव को देखने के लिए आंखें तरस जाती हैं। यह पीड़ा जिस पर गुजरती है उससे भला और कोई नहीं समझ सकता। ऐसे ही परिवारों का दर्द समझने वाला एक व्यक्ति वर्षों से मृत्यु के बाद शवों को वतन तक लाने जैसे अंतिम विदाई वाले हवन में आहुतियां दे रहा है।
जी हां! हम आपकों ऐसे ही व्यक्ति का सच बता रहे हैं, जो किसान का बेटा होकर स्थानीय लोगों के लिए 'मसीहाÓ बना हुआ है। दुबई में मरने वाले लोगों को वह सात समंदर पार से मूल वतन लेकर आता है। सुनने में यह सब कुछ आपको अजीब सा अहसास कराता है, लेकिन उदयपुर जिले के वल्लभनगर तहसील के तारावट ग्राम पंचायत के शोभागपुरा गांव निवासी शंकरलाल गुर्जर की समाजसेवा लोगों के लिए आसरा बनी हुई है। दुबई में किसी भारतीय की प्राकृतिक और दुर्घटना में होने वाली मौत के बाद शंकरलाल शवों को देश लाने में मदद करता है। वह खुद मृतक के परिजनों को जिम्मेदारी से शव सुपुर्द करता है। शंकरलाल अब तक करीब 17 शवों को दुबई से लाने में सक्रिय रहा है। वहीं 4 शवों को देश का बाहर भेजने में मदद करता रहा है। बीते चार से सेवाएं दे रहे शंकरलाल का मानना है कि अंत्येष्टि का अर्थ जिंदगी का अंतिम यज्ञ है।

मुसलमान भाइयों से हुए प्रेरित
शंकरलाल लम्बे समय से दुबई में है । शव को भारत लाने के इस अनोखे कार्य की प्रेरणा उसे साथी दो मुसलमान भाइयों से मिली। मूलत: केरल निवासी और दुबई में कार्यरत अशरफ व नासर भारतीय मृतकों के शवों को देश भेजते रहते हैं। उनसे प्रेरित होकर शंकर लाल ने वर्ष 2016 में इस कार्य की शुरुआत की। शंकर ने सोचा कि़ जब मुसलमान, मजहब और धर्म विशेष के बारे में नहीं सोचकर राष्ट्रधर्म निभा रहे तो क्यों न वह भी वतन के लिए जिम्मेदारी अदा करे। इसके बाद से शंकरलाल ने हर धर्म के व्यक्ति को देश भेजने का संकल्प शुरू किया।

जटिल है प्रकिया
दुबई से किसी शव को लाने की प्रकिया काफी जटिल है। अनगिनत कार्रवाई कानूनी मसलों और मामले की जांच के बाद शव को भेजने की अनुमति मिलती है। कभी-कभी तो इस मंजूरी में ६ माह तक बीत जाते हैं। ऐसे में शंकरलाल का सहयोग भारतीय दूतावास के डेथ सेक्सन के इन-आउट पास अधिकारी और लखनऊ मूल के निवासी मिस्टर पाठक करते हैं। शंकरलाल खुद के स्तर पर धन ही खर्च नहीं करते बल्कि शवों को परिजनों को सुपुर्द करने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। न्यूनतम ४ दिन और अधिकतम ६ माह अवधि वाले शवों को आवश्यक दस्तावेज के साथ शंकरलाल ने परिजनों को सौंपे हैं।

७५ रुपए की नौकरी थी अब कंपनी
शोभागपुरा के किसान परिवार में जन्में शंकरलाल ने छठी तक पढ़ाई की और 12 साल की उम्र में मुंबई चले गए थे। शुरुआत में उन्होंने 75 रुपए महीने की नौकरी की। बाद में चाय वाले की दुकान में काम किया। वहां 230 रुपए मासिक पगार थी। पांच साल कुकिंग सीखकर शंकरलाल मित्रों के संपर्क में आया और 2001 में इराक चले गए। 18 माह काम कर दुबई चल दिए। लम्बे संघर्ष के बाद 2011 में खास मित्र नरसाराम से आर्थिक सहायता लेकर खुद की कम्पनी अलनुर स्टार बिल्डिंग क्लीनिंग खोली, जिसमें ३५ जनों के स्टाफ को मासिक 20 लाख रुपए तनख्वाह देते हैं। उनकी खुद की दुबई में दो कंपनियां हैं।

इन शवों को सौंपा
अंगामुधु (तमिलनाडू), हैदराबाद के मोहम्मद अजीज, गोरखपुर के ओमपाल, पंजाब के मंजीत, बिहार के बकाराम, तिरपुरम के प्रकाश कल्याना, केरल के सुबेदा, अहमदाबाद के तुषार कुमार, राजस्थान के लक्ष्मी लाल नागदा, मुंबई के ताकिर हुसैन, शिमला के वीरेंद्र शर्मा, सिलीगुड़ी के नटराज शर्मा, गोवा के माधवी शेखर, मध्यप्रदेश के यूसुफ खान, मनीकुनुमल के हाशिम, गुजरात की जयश्री बेन, कोलकाता के सुभाष शाह के शवों को देश में उनके परिजनों को सौंपा।

Published on:
30 Jun 2019 06:00 am