
उदयपुर . राजप्रासाद से नीचे उतरने वाली जगदीश चौक की तंग गलियों में पैदा होने वाले अनेक लोगों सहित शहरवासी आज भी कवि सम्मेलनों के मंच पर श्रृंगार और हास्य रस की पैरोडि़यों से श्रोताओं को भाव-विभोर करने वाले पंडित विश्वेश्वर शर्मा द्वारा लिखे फिल्मी गीत गाते-गुनगुनाते हैं। होली गीत हो या गुजराती गरबियां या फिर हो कविता, गीत, गजल और भजन पण्डितजी का सृजन हर बार कुछ हटकर रस देता था। भारतीय काव्य मंच पर पैरोडिय़ों का परिचय कराने वाले पंडित शर्मा ने मुंबई पहुंचकर ढेर चुलबुले और शरारती गीतों द्वारा अपने सृजन का एेसा रंग जमाया। जिसे लोग बरसों बरस लोग बिसरा नहीं पाएंगे।
शहर में इनके साथ पले-बढ़े साथी बताते हैं कि मस्तमौला कवि और चुलबुला गीतकार अपनी जवानी के दिनों में चंग की थाप पर फागुनी गीतों की सुर लहरियां छेड़ते मोहल्ले से निकलता तो पीछे मस्तानों का रैला साथ चलता था। युवा रंगकर्मी नीलाभ शर्मा बताते हैं कि होली के अवसर पर आज भी लेकसिटी की चारदीवारी में जगदीश चौक मंदिर के अलावा लक्ष्मीनारायण देव मंदिर, भट्टियानी चोहट्टा में भट्ट मेवाड़ा समाज की ओर से फागोत्सव मनाया जाता है। होली से १०-१५ दिनों पूर्व से ही बच्चों, युवाओं और वरिष्ठजनों संग महिलाएं भी मंदिर प्रांगण में एकत्र होकर ढफ-चंग के अलावा अन्य वाद्यों पर फाग गाते हैं। दरअसल, फागोत्सव वंृदावनधाम में राधा-कृष्ण के प्रेमरंग और भक्ति की असल तस्वीर पेश करता है। क्षेत्रवासी सहित समाजजन और कई श्रद्धालु होली तक मंदिर में नित्य प्रति रास तथा फाग के रस में डूबते गहराते मस्ती और उमंग बिखेरते हैं। वहीं, धूलेंडी पर समाज प्रतिनिधी शोक संतप्त परिवारों में जाकर सांत्वना प्रदान करते हैं।
इसके साथ ही नवजात बच्चों का ढंूढ़ोत्सव भी मनाया जाता है। एेसे ही बरसों से दोपहर बाद तक गली-मोहल्लों में रंग की फुहारों के बीच होली की मस्ती में चंग की थाप पर फागुनी स्वर लहरियां गंूजती रहती है। साल दर साल से भक्ति संगीत की रसधार यूं ही निर्बाध बह रही है।