कोफ्तगिरी शब्द पैटर्न को "पीटकर" लोहे में बदलने की क्रिया को संदर्भित करता है, जो एक गहरे धातु पर हल्के धातु को जड़ने की एक कला है, जो विस्तृत और भव्य तराशी हुई सोने या चांदी की पत्ती के साथ एक सजावटी उपस्थिति प्रदान करती है।
अब तक राजस्थान की 16 हस्त कलाओं और वस्तुओं को जीआइ टैग (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) या भौगोलिक संकेतक मिल चुका था, लेकिन अब हाल ही 5 और हस्तकलाओं के नाम इसमें शामिल हो चुके हैं। इनमें उदयपुर की कोफ्तगिरी, राजसमंद नाथद्वारा की पिछवाई कला, जोधपुर की बंधेज, बीकानेर की उस्ता कला और हस्त कढ़ाई कला शामिल हुई हैं। इसके साथ ही अब राजस्थान की 21 कलाओं और वस्तुओं को जीआइ टैग हासिल हो चुका है। गौरतलब है कि उदयपुर की एक भी कला को अब तक जीआइ टैग नहीं मिला था, जिसे लेकर पत्रिका ने खबरों का प्रकाशन किया था, अब कोफ्तगिरी कला के साथ ही उम्मीद बढ़ी है कि यहां की अन्य प्रसिद्ध कलाओं व वस्तुओं को भी जल्द ही जीआइ टैग से एक नई पहचान मिल जाएगी।
कोफ्तगिरी शिल्प आयुध और हथियार अलंकरण की एक पारंपरिक तकनीक
कोफ्तगिरी आर्टिस्ट डॉ. श्यामलता राजेश गहलोत ने बताया कि यह कोफ्तगिरी शिल्प आयुध और हथियार अलंकरण की एक पारंपरिक तकनीक है जो भारत के राजस्थान राज्य में लोकप्रिय है। कोफ्तगिरी शब्द पैटर्न को "पीटकर" लोहे में बदलने की क्रिया को संदर्भित करता है, जो एक गहरे धातु पर हल्के धातु को जड़ने की एक कला है, जो विस्तृत और भव्य तराशी हुई सोने या चांदी की पत्ती के साथ एक सजावटी उपस्थिति प्रदान करती है। पारंपरिक कोफ्तगिरी रूपांकनों में बहुत सारी रेखाएं और वक्र होते हैं जो सोने और चांदी के तारों से बनाए जाते हैं। इस कला के बारे में सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस प्रक्रिया में कोई मशीन शामिल नहीं होती है और इसे केवल कुशल कारीगरों द्वारा ही किया जाता है। मुख्य रूप से कोफ्तगिरी शिल्प का उपयोग तलवारों और खंजरों के हैंडल और उपयोगी वस्तुएं जैसे तलवार, छड़ी, बॉक्स, ज़ाम्बिया पर कोफ्तगिरी का व्यापक रूप से राजस्थान के पारंपरिक कवच बनाने वाले मारू लोहारों द्वारा हथियारों की एक शृंखला बनाने के लिए उपयोग किया जाता था। कोफ्तगिरी पारंपरिक शिल्प है क्योंकि यह मेवाड़ जिले में दशकों से प्रचलित है। यह शिल्प उदयपुर में देखा जा सकता है। जयपुर में आयात- निर्यात बाजार में कोफ्तगिरी देखी जा सकती है। जबकि, उदयपुर, वह स्थान है जहां समूह पाए जाते हैं जहां कोफ्तगिरी का अभ्यास किया जाता है। ऐसे समय में जब शिल्प का उपयोग व्यावसायिक उत्पादन के लिए किया जाता है, तब भी बहुत सारे कारीगर हैं जो इस शिल्प का अभ्यास करते हैं और अपनी विशेषज्ञता को बढ़ाने के लिए इस व्यावसायिक उत्पादन का उपयोग करते हैं, लेकिन बाजार निश्चित रूप से बहुत छोटा है। यह अनूठी कला पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। यह उत्पाद कॉर्पोरेट उपहार देने के लिए उपयुक्त है।
20 सालों से कर रही ये काम
डॉ. गहलोत ने बताया कि पिछले 20 वर्षों से कोफ्तगिरी आर्ट का काम कर रही हूं। ये पुरुष प्रधान कार्य होने की वजह से मुझे महिला होने पर समाज का बहिष्कार भी सहना पड़ा। लेकिन पति राजेश गहलोत का सहयोग रहा, उनके जाने के बाद पिता दुर्गाशंकर ने मार्गदर्शन दिया। 2019 में राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला। इस कला को बढ़ावा देने के लिए इसके इतिहास पर शोध किया। जीआइ टैग मिलने से इस कला को लेकर और जागरूकता बढ़ेगी, खरीदार बढ़ेंगे और कलाकार भी बढ़ेंगे। ये एक पौराणिक कला है, जिसे पहचान मिलनी ही चाहिए।