
Champa Bagh Land Dispute Case: 43 साल से विवादों में चल रही सुखाड़िया विश्वविद्यालय की चंपाबाग भूमि अवाप्ति प्रक्रिया को लेकर गुरुवार को हाईकोर्ट की डिवीजनल बेंच में सुनवाई हुई। सामने आया कि प्रशासन ने हाईकोर्ट के 30 मई 2024 के आदेश की पालना करते हुए काबिज लोगों को भूमि अवाप्ति अधिनियम के तहत नोटिस दिए हैं। यह तथ्य सामने आने के साथ ही हाईकोर्ट ने सुविवि की ओर से दायर अवमानना याचिका का निस्तारण कर दिया।
हाईकोर्ट में सुविवि की ओर से पैरवी अधिवक्ता अंकुर माथुर ने की। उन्होंने कहा कि एक तरफ तो सरकार ने कोर्ट को आश्वासन दिया है कि 5(अ) का नोटिस दे दिया गया है और जमीन अवाप्ति की प्रक्रिया चालू है, इसके आधार पर कंटेम्प्ट निरस्त हो गया है। दूसरी तरफ एडीएम ने हाल ही में सरकार और उच्च शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर अवाप्ति प्रक्रिया को रद्द करने की सिफारिश की थी। वजह बताई कि चंपाबाग की जमीन पर कई परिवार बसे हैं और नगर निगम ने पट्टे दे दिए हैं। अधिवक्ता माथुर ने कहा कि यूनिवर्सिटी से विचार-विमर्श किए बिना पत्र लिखना नियमों के खिलाफ है। चूंकि सरकार ने हाईकोर्ट में प्रक्रिया जारी रखने की बात कही है, इसलिए यदि इसे वापस लेते हैं तो यह कोर्ट को गुमराह करने जैसा माना जा सकता है।
सुविवि ने चंपाबाग की जमीन अवाप्त करने की पेशकश साल 1981 में शुरू की थी। तब से यह मामला 4 दशकों से अधिक समय तक अटका रहा। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 30 मई 2024 को निर्देश दिए थे कि प्रभावित खातेदारों को धारा 5-ए के तहत आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर दिया जाए। आदेश के 2 साल बीतने और यूनिवर्सिटी की ओर से लगातार पत्राचार करने के बाद भी प्रशासन ने कार्रवाई शुरू नहीं की। इस पर कोर्ट के आदेश की अवहेलना होने पर यूनिवर्सिटी को अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।
मामले के OIC देवेन्द्र सिंह राठौड़ ने कहा कि स्टे के दौरान ही जमीन पर कई रिहायशी मकान, रिसॉर्ट, वाटिकाएं और व्यावसायिक इमारतें खड़ी कर दी। इसी दौरान धड़ल्ले से रजिस्ट्रियां हुईं, निर्माण स्वीकृतियां दी गईं और प्रशासन ने मूलभूत सुविधाएं भी दे दी। सुविवि ने समय-समय पर स्थिति पर रोक लगाने के लिए पत्र भी लिखे थे।
भूमि अवाप्ति कानून की धारा 5-ए के तहत जमीन मालिकों को अधिग्रहण के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराने का कानूनी अधिकार मिलता है। इससे पहले साल 2007 में भी ऐसी ही सुनवाई कर जमीन पर काबिज लोगों की आपत्तियां खारिज की जा चुकी है, लेकिन 2008 में फिर से स्टे मिलने से मामला अटक गया था। अब गिर्वा तहसीलदार व भूमि अवाप्ति अधिकारी की ओर से प्रभावित खातेदारों की आपत्तियां सुनी जाएंगी। इसके बाद रिपोर्ट राजस्थान सरकार को भेजेंगे, जिसके आधार पर जमीन अधिग्रहण की अंतिम वैधानिक कार्रवाई संभव है।