
भुवनेश पंड्या/उदयपुर. मोहनलाल सुखाडिय़ा विवि में राजेश दुबे की नियुक्ति के लिए किस तरह से तैयारी की गई, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तमाम अधूरे दस्तावेजों के बाद भी बेरोकटोक उन्हें ले लिया गया, जबकि इनके स्थान पर कोई ओर होता तो उसकी नियुक्ति किसी स्थिति में होना असंभव थी। आखिर दुबे को इतनी कमियों पर भी नियुक्ति देकर तत्काल उन्हें एनआरसी की कमान सौंपने के पीछे क्या गणित है, इस पर हर अधिकारी चुप्पी साधे बैठे है। दूसरी ओर जयनारायण व्यास विवि किसी भी स्थिति में एनओसी जारी करने के लिए साफ मना कर रहा है।
ये है नियम: किसी भी व्यक्ति को बिना एनओसी के कभी भी किसी भी पद पर ज्वाइन नहीं करवाया जा सकता है। यह कानूनन आधार पर लिखा गया है। 2017 के नियुक्ति के नियम के आधार पर स्पष्ट प्रावधान है कि वर्तमान में कोई व्यक्ति किसी संस्था में पहले से ही कार्यरत है, तो ज्वाइनिंग के समय नियोक्ता से जारी की गई एनओसी को जमा करवाएगा, लेकिन दुबे के मामले में ज्वाइनिंग के समय इस तरह की एनओसी नहीं ली गई। राजस्थान यूनिवर्सिटी टीचर्स एण्ड ऑफिसर्स एक्ट 1974 के तहत मौजूदा नियोक्ता का नो ओब्जेक्शन सर्टिफिकेट जरूरी है। ऐसे में दुबे को बिना एनओसी के ज्वाइनिंग करवाने का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है।
जयनारायण व्यास विवि ने दर्ज करवाई है एफआईआर की पुनर्याचिका
जयनारायण व्यास विवि जोधपुर विवि ने जांच करवाई थी। दुबे पर वित्तीय गड़बड़ी के जार्च है, चार्जशीट देकर उन्हें एचआरडीसी के निदेशक पद से हटाया गया था, इसके बाद वह कोर्ट चले गए, और फिर पद पर आए। एलपीजीएमसी ( लोकल प्रोग्राम मैनेजमेंट कमेटी) को लिखकर भेजा गया है। इनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करवाई थी, हालांकि दुबे कोर्ट गए और वहां से एफआर लग गई, लेकिन विवि ने फिर से उनके खिलाफ याचिका दर्ज करवाई है, जो प्रक्रियाधीन है। बिना अनुमति के आवेदन करने और बिना अनुमति के वे गए हैं, एनओसी किसी स्थिति में नहीं दी जा सकती।
भंवरसिंह सांधु, रजिस्ट्रार जयनारायण व्यास विवि जोधपुर