
उदयपुर की मंडी में बिक रहे तोतापुरी और अन्य किस्मों के आम। पत्रिका
उदयपुर. देश के अलग-अलग शहरों में पैदा होने वाले आमों से उदयपुर का बाजार सजता है। यहां आम के शौकीनों को एक ही जगह करीब 45 तरह की अलग-अलग किस्मों का स्वाद मिल रहा है। रत्नागिरी का महंगा और खुशबूदार अल्फांसो हो या गुजरात का खास केसर, उत्तर प्रदेश का दशहरी-लंगड़ा-चौसा हो या आंध्र प्रदेश का तोतापुरी हर आम की अपनी अलग पहचान और अपना अलग ग्राहक वर्ग है। आम का सीजन अब अंतिम दौर में पहुंच चुका है, लेकिन बाजार में अब भी इनकी मांग बनी हुई है।
उदयपुर में सबसे महंगे आमों में रत्नागिरी का अल्फांसो और गुजरात का केसर शामिल हैं। स्वाद, खुशबू और गुणवत्ता के कारण इन दोनों किस्मों के अपने खास ग्राहक हैं। वहीं आमरस बनाने के लिए तोतापुरी सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है और यही उदयपुर के बाजार में सबसे अधिक बिकने वाली किस्मों में शामिल है।
शुरुआत तमिलनाडु से, अब आंध्र प्रदेश ने संभाला बाजार
उदयपुर में आम की आवक का सीजन सामान्य तौर पर अप्रेल से जुलाई के अंत या अगस्त की शुरुआत तक चलता है। सीजन की शुरुआत तमिलनाडु से आने वाले आमों से होती है। इसके बाद आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आम की आवक बढ़ती है। आंध्र प्रदेश से आने वाले तोतापुरी, बादाम, नीलम और अन्य किस्मों की आवक मजबूत रही। गुजरात से आने वाला केसर और रत्नागिरी का अल्फांसो अपनी प्रीमियम पहचान के कारण अलग वर्ग के ग्राहकों को आकर्षित करता है। उत्तर प्रदेश से आने वाला दशहरी अब अंतिम दौर में है, जबकि लंगड़ा करीब 10 से 12 दिन और बाजार में आने की उम्मीद है। चौसा भी अब सीजन के अंतिम चरण में पहुंच चुका है।
सीजन में रोज 8 से 10 गाड़ियां
फल कारोबारी गिरीश चुघ के अनुसार पीक सीजन में उदयपुर में रोजाना 8 से 10 गाड़ियां आम की आती थीं। एक गाड़ी में औसतन करीब 15 टन आम होता है। इस हिसाब से सीजन के दौरान रोजाना करीब 120 से 150 टन आम की आवक और खपत होती रही। अब सीजन समाप्ति की ओर है, इसलिए आम की आवक घटकर करीब 5 से 6 गाड़ियां प्रतिदिन रह गई हैं। उदयपुर के थोक बाजार से आम 100 से 200 किलोमीटर के दायरे में भी भेजा जाता है। आम के थोक कारोबार से शहर में करीब 10 से 12 प्रमुख व्यापारी जुड़े हैं।
देसी आम का स्वाद भी बरकरार
बाजार में देश के अलग-अलग राज्यों से आने वाले आमों के बीच मेवाड़-वागड़ का देसी आम भी अपनी अलग पहचान रखता है। सलूंबर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा बेल्ट में पैदा होने वाला देसी आम करीब एक महीने तक बाजार में रहता है। इसे खासतौर पर चूसकर खाने के लिए पसंद किया जाता है।
Updated on:
22 Jul 2026 06:00 pm
Published on:
22 Jul 2026 06:00 pm
