हालात ऐसे हैं कि लोग अब पंचायत व्यवस्था को ही बेहतर कहने लगे हैं।पंचायतों के समय जहां हर साल 70 से 80 लाख रुपए तक विकास कार्यों के लिए मिलते थे, वहीं निगम में शामिल होने के बाद इन क्षेत्रों में फंडिंग लगभग बंद हो गई है। नतीजतन, न तो विकास कार्य हो पा रहे हैं और न ही रोजमर्रा की सफाई व्यवस्था सुचारू है। हालात इतने खराब हैं कि कई जगह रोजाना झाड़ू तक नहीं लग पा रही और डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण पूरी तरह ठप है। सड़कों पर कचरे के ढेर जमा हैं, जबकि ड्रेनेज सिस्टम जाम होने से गंदा पानी यहां-वहां बह रहा है।
उदयपुर. नगर निगम का दायरा बढ़ाकर 23 पंचायतों के 48 गांव शामिल तो कर लिए गए, लेकिन इन गांवों में हालात नहीं बदले, यहां के लोगों को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल रही। हालात ऐसे हैं कि लोग अब पंचायत व्यवस्था को ही बेहतर कहने लगे हैं।पंचायतों के समय जहां हर साल 70 से 80 लाख रुपए तक विकास कार्यों के लिए मिलते थे, वहीं निगम में शामिल होने के बाद इन क्षेत्रों में फंडिंग लगभग बंद हो गई है। नतीजतन, न तो विकास कार्य हो पा रहे हैं और न ही रोजमर्रा की सफाई व्यवस्था सुचारू है। हालात इतने खराब हैं कि कई जगह रोजाना झाड़ू तक नहीं लग पा रही और डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण पूरी तरह ठप है। सड़कों पर कचरे के ढेर जमा हैं, जबकि ड्रेनेज सिस्टम जाम होने से गंदा पानी यहां-वहां बह रहा है।--
शिकायतों के बावजूद समाधान नहीं
पत्रिका टीम के ग्राउंड दौरे में सामने आया कि निगम की गाड़ियां नियमित रूप से इन गांवों तक नहीं पहुंच रही हैं। शिकायतें करने के बावजूद समाधान नहीं हो रहा। 23 पंचायतों में एक भी कचरा संग्रहण टेम्पो संचालित नहीं हो रहा, इससे ग्रामीणों को निजी स्तर पर व्यवस्था करनी पड़ रही है। कानपुर पंचायत में जनसहभागिता से कचरा संग्रहण की कोशिश जरूर की जा रही है, लेकिन यह व्यवस्था भी सीमित है और स्थायी समाधान नहीं बन पाई है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत व्यवस्था के दौरान न केवल सफाई होती थी, बल्कि मनरेगा के तहत भी गांवों में साफ-सफाई और छोटे विकास कार्य नियमित होते थे। अब निगम में शामिल होने के बाद ये सभी व्यवस्थाएं ठप पड़ गई हैं।
दस्तावेजों के लिए भी लग रहे फेरे
नए गांवों में स्थिति केवल सफाई तक सीमित नहीं है। जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेजों के लिए भी ग्रामीणों को चक्कर काटने पड़ रहे हैं। यूडीए से निगम में शामिल किए गए नए क्षेत्रों की फाइलें तक अभी पूरी तरह ट्रांसफर नहीं हुई हैं, इससे स्वीकृतियों के काम अटके पड़े हैं। सबसे गंभीर पहलू यह है कि बिना स्वीकृति बड़े-बड़े रिसोर्ट और फार्म हाउस बन रहे हैं, लेकिन उनकी निगरानी करने वाला कोई नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि नगर निगम विस्तार बिना ठोस योजना के किया गया। न तो संसाधनों का विस्तार हुआ, न बजट बढ़ाया गया और न ही नए क्षेत्रों के लिए अलग प्रशासनिक ढांचा तैयार किया गया। पहले से ही 70 वार्डों का प्रबंधन करने में संघर्ष कर रहे निगम पर अतिरिक्त भार पड़ गया है।
उदयपुर में नगर निगम का विस्तार बिना तैयारी के किया गया कदम साबित होता नजर आ रहा है। नए जुड़े गांव न तो पूरी तरह शहरी सुविधाएं पा सके हैं और न ही उन्हें ग्रामीण व्यवस्था का लाभ मिल रहा है। अगर जल्द ठोस योजना और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो यह समस्या आने वाले समय में बड़ा जनआंदोलन बन सकती है।
गेहरीलाल डांगी, पूर्व वार्ड पंच कानपुर
डेढ़ साल पहले पंचायतों को निगम में शामिल कर दिया, लेकिन व्यवस्था पूरी तरह ठप है। सफाई व्यवस्था बंद है, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करने वाला कोई नहीं है। पुराने विकास कार्यों के बिल अटके पड़े हैं और पट्टों की फाइलें लंबित हैं। नरेगा के काम बंद हो गए हैं और उद्यान भी बदहाल हो रहे हैं। प्रशासन ने केवल औपचारिकता के तौर पर कैंप लगाए और फिर स्थिति जस की तस छोड़ दी।
चंदन सिंह देवड़ा, संघर्ष समिति के संयोजक--
एक साल से ज्यादा समय हो गया, लेकिन कोई सुध लेने वाला नहीं है। रोड लाइट बंद हैं, नालियों की सफाई नहीं हो रही और कचरा हर जगह फैला हुआ है। जरूरी प्रमाण पत्र तक नहीं बन पा रहे। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायतों को निगम में मर्ज तो कर दिया गया, लेकिन न तो सरपंचों को प्रशासक बनाया गया और न ही निगम ने पूरी जिम्मेदारी संभाली।
प्रकाश प्रजापत, भुवाणा क्षेत्रवासी