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सड़कों से गोशाला तक का सफर, बीमार और लाचार गोवंश को बनाया सेवा का लक्ष्य

गोसेवा की यह पहल करीब पांच वर्ष पूर्व परशुराम चौराहा क्षेत्र के युवाओं ने शुरू की। हार्दिक मेनारिया ने बताया कि शुरुआत में वे सड़कों पर ही घायल और बीमार गायों की सेवा करते थे। इसी दौरान लंपी वायरस के प्रकोप के दौरान बलीचा स्थित कृषि मंडी में नगर निगम के कैंप में सेवा के लिए पहुंचे, वहां कई गायों को तड़पते देखा। तब से ही गोशाला स्थापित करने का निर्णय लिया गया।

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गोशाला में दुर्घटनाओं, पैंथर के हमलों और बीमारियों से ग्रस्त गायों को रखा जाता है। कई मामलों में गायों के पैर काटने की नौबत आ चुकी है, तो एक नंदी का निचला जबड़ा तक क्षतिग्रस्त हो चुका है।

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पांच वर्षों से घायल, बीमार और लाचार गायों के उपचार में जुटी युवाओं की टोली-संसाधनों की कमी के बावजूद सेवा कार्य जारी, सरकारी सहयोग की जरूरत

उदयपुर. शहर की सड़कों पर अक्सर घायल और बीमार पशुओं को देखकर लोग दूरी बना लेते हैं, लेकिन कुछ युवाओं ने इस सोच को बदलते हुए सेवा का ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसने सैकड़ों गोवंश को नया जीवन दिया है। पांच वर्षों से ये ये युवा न सिर्फ सड़कों से घायल गायों को उठाकर ला रहे हैं, बल्कि उन्हें उपचार और आश्रय भी दे रहे हैं।पांच साल पहले हुई शुरूआत

गोसेवा की यह पहल करीब पांच वर्ष पूर्व परशुराम चौराहा क्षेत्र के युवाओं ने शुरू की। हार्दिक मेनारिया ने बताया कि शुरुआत में वे सड़कों पर ही घायल और बीमार गायों की सेवा करते थे। इसी दौरान लंपी वायरस के प्रकोप के दौरान बलीचा स्थित कृषि मंडी में नगर निगम के कैंप में सेवा के लिए पहुंचे, वहां कई गायों को तड़पते देखा। तब से ही गोशाला स्थापित करने का निर्णय लिया गया। पहले परशुराम चौराहा पर खाली भूखंड पर ‘अपना घर’ गोशाला शुरू की गई। बाद में यूआईटी ने वो जगह खाली करवा दी। इसी के साथ समीप ही नई जगह उपलब्ध कराई गई, यहां पर वर्तमान में सेवा कार्य जारी है, लेकिन यह स्थान भी गोशाला के नाम नहीं है।

गंभीर रूप से घायल गायों का हो रहा उपचार

गोशाला में दुर्घटनाओं, पैंथर के हमलों और बीमारियों से ग्रस्त गायों को रखा जाता है। कई मामलों में गायों के पैर काटने की नौबत आ चुकी है, तो एक नंदी का निचला जबड़ा तक क्षतिग्रस्त हो चुका है। एक नंदी बचपन से अंधा है, एक बछड़ी के पिछले दोनों पैर टूट गए हैं, एक गाय के दोनों अगले पैरों के जोड़ निकल जाने जैसी गंभीर स्थिति में भी युवा पूरे मनोयोग से जानवरों की सेवा कर रहे हैं।

संसाधनों की कमी से भी नहीं टूटा हौसला

युवाओं के अनुसार गोशाला में जगह कम पड़ रही है, इससे स्वस्थ हो चुकी गायों को बाहर छोड़ना पड़ता है। यदि सरकारी स्तर पर पर्याप्त भूमि उपलब्ध हो जाए तो सेवा कार्य और बेहतर तरीके से किया जा सकता है। करीब डेढ़ वर्ष पूर्व एक दानदाता की ओर से एंबुलेंस उपलब्ध कराए जाने के बाद घायल गायों को लाने और उनके उपचार के काम में तेजी आई है।

बूढ़ी गायों को छोड़ रहे मालिक

सेवा कार्य के दौरान यह भी सामने आया कि कई पशुपालक वर्षों तक दूध लेने के बाद बूढ़ी गायों के टैग हटाकर उन्हें सड़कों पर छोड़ देते हैं। ऐसी लाचार गायों को भी गोशाला में आश्रय दिया जा रहा है, इनमें कई तो खड़ी होने में भी असमर्थ हैं।

ऑटो के जरिए जमा कर रहे गोग्रास

श्रीराम गोसेवा समिति की ओर से एक ऑटो के माध्यम से शहर के विभिन्न क्षेत्रों से सुबह रोटियां एकत्रित की जाती हैं। इन्हें अलग-अलग गोशालाओं में वितरित कर गायों के भोजन की व्यवस्था की जाती है।

शहर में इन स्थानों पर भी हो रही गोसेवा

उदयपुर में महाकालेश्वर मंदिर गोशाला (रानी रोड), शिवशंकर गोशाला (बिलिया), मां हिंगलाज सेवा समिति (नागदा), गोविंद गोपाल गो सेवा समिति (टेकरी-मादड़ी लिंक रोड), श्री हरि गो सेवा संस्थान (पहाड़ा), निमय गो धाम (बेदला) और गोकुल गोशाला सहित दो दर्जन से अधिक गोशालाएं संचालित हैं। इसके अलावा कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी गोवंश की सेवा में सक्रिय हैं।