उदयपुर

अब बदल रहे हैं मर्दानगी के मायने 

मर्दानगी की अवधारणा को अब बदला जा रहा है। किशोरवय युवाओं को पुरुषत्व की नई परिभाषा सिखा रहे हैं

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Nov 19, 2024
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मैं मर्द हूं, मेरे परिवार की महिलाएं क्या करेंगी, क्या नहीं, कहां जाएंगी, कहां नहीं। गुस्से में कभी कभार स्त्री पर हाथ उठा दिया तो इसमें गलत क्या ? मर्दानगी की इन अवधारणाओं को अब बदला जा रहा है। किशोरवय युवाओं को पुरुषत्व की नई परिभाषा सिखा रहे हैं। लैंगिक समानता के विषयों को लड़कों के व्यवहार में उतारने के जतन हो रहे हैं। यूनिसेफ के पायलट प्रोजेक्ट के रूप में राजस्थान के उदयपुर जिले में चार साल पहले हुई इस बदलाव की शुरुआत को अब प्रदेश और देश में नई उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है।उदयपुर जिले के गोगुंदा उपखंड के 30 गांवों में वर्ष 2021 में जतन संस्थान की ओर से ÒसहयोगीÓ परियोजना के तहत 11 से 14 वर्ष उम्र के लड़कों के बीच इस अनूठी मुहिम की शुरुआत हुई। इन गांवों के किशोरों के 30 अलग-अलग समूह बनाए गए। जिनमें करीब 850 किशोर शामिल हैं। प्रशिक्षण और गतिविधियों के माध्यम से इन किशोरों के व्यक्तित्व में लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना शुरू किया। जिसके सकारात्मक नतीजे हाल ही में किए गए एक सर्वे में सामने आए। सर्वे के दौरान इन 30 गांवों और अन्य 30 गांवों के 70-70 बालकों से ऐसे प्रश्न पूछे गए, जिनमें उनका महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण परिलक्षित होता है। सर्वे में यह सामने आया कि जिन गांवों के बालकों को मुहिम में शामिल किया गया है, वे अपने आप को समाज में स्त्री सुलभ माने जाने वाले कार्यों को करने में सहज पाते हैं। साथ ही महिलाओं को उन भूमिकाओं में देखने में उन्हें परहेज नहीं, जिन्हें सिर्फ पुरुषों का क्षेत्र माना जाता है। जबकि अन्य 30 गांवों के बालकों में इन सवालों के जवाब पारम्परिक रूप से पुरुष प्रधान समाज की आवधारणा के अनुरूप थे।

3 ए बनाम 3 वी की अवधारणा पर कार्य

परियोजना के तहत संस्थान की ओर से 3 ए बनाम 3 वी की अवधारणा पर कार्य किया जा रहा है। किशोरों में 3 ए अर्थात अहंकार, आधिपत्य और आक्रोश के भावों को 3 वी में बदलने का लक्ष्य है। इसमें 3 वी का तात्पर्य वॉइस अर्थात महिआ अधिकारों के लिए आवाज उठाएं, वायलेंस यानी उनके प्रति हिंसा को रोकें और विस्टा ऑफ अपॉर्चुनिटीज यानी अवसर प्रदान करें। इसके लिए संस्थान की ओर से किशोंरों के समूहों की विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जा रही है। विभिन्न विद्यालयों के शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है तथा इन समूहों के बालकों के अभिभावकों को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है।

पानी लाने, झाडू लगाने और खाना पकाने से नहीं परहेज

इस परियोजना के तहत 30 गांवों के 30 समूहों से जुड़े किशोरवय बालकों के व्यवहार में बदलाव देखा जा रहा है। अब वे घर के कार्य करना जैसे पानी लाना, झाडू लगाना या खाना पकाना आदि में संकोच नहीं करते। घर का काम - सबका काम जैसी गतिविधि के तहत उनके मन से पुरुषत्व की गलत परिभाषा को बदला गया। इसी तरह शारीरिक ताकत को पुरुषत्व की पहचान जैसे भाव को बदलने के लिए दादागिरी नहीं मददगिरी का नारा दिया। जिसमें उनमें स्टंट दिखाने या शक्ति प्रदर्शन के बजाय दूसरों की मदद के भाव पैदा किए। लड़कियों को प्रोत्साहित या अवसर देने के लिए इन बालकों के समूह ने पिछले दिनों गोगुंदा उपखंड के मजावद में लड़कियों के क्रिकेट मैच का आयोजन किया।

इनका कहना ....

हमारे समाज में लैंगिक समानता की बातें तो होती है, लेकिन यह लड़कियों से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म हो जाती है। जबकि इसके लिए समाज के पुरुषों के व्यवहार में बदलाव की आवश्यकता है। उनके मन में मर्दानगी के प्रति जो भ्रांतियां है, उन्हें बदलने की जरूरत है। इसी के लिए यूनिसेफ के पायलट प्रोजेक्ट के रूप में उदयपुर जिले के गोगुंदा उपखंड में सहयोगी परियोजना संचालित की जा रही है। इसके सकारात्मक परिणामों के बाद अब देश की अन्य संस्थाएं भी ऐसे काम हाथ में लेने के लिए रुचि दिखा रही हैं। उम्मीद है कि अन्य जिलों में भी यह परियोजना शुरू की जाएगी।

- डॉ. कैलाश बृजवासी, संचालक, जतन संस्थान, उदयपुर

Updated on:
19 Nov 2024 12:13 pm
Published on:
19 Nov 2024 10:49 am
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