आज विश्व भूवैज्ञानिक दिवस विशेष: मेवाड़ सहित प्रदेश के खनन और भूगर्भ की गतिविधियों में अहम भूमिका निभा रहे भू वैज्ञानिक उदयपुर. राजस्थान की पहचान एक बार फिर देश के ‘खनिज हब’ के रूप में सामने आती है। इस पहचान के पीछे सबसे बड़ा योगदान उन भूवैज्ञानिकों का है, जिन्होंने धरती की गहराइयों में छिपे […]
उदयपुर. राजस्थान की पहचान एक बार फिर देश के 'खनिज हब' के रूप में सामने आती है। इस पहचान के पीछे सबसे बड़ा योगदान उन भूवैज्ञानिकों का है, जिन्होंने धरती की गहराइयों में छिपे संसाधनों को खोजकर राज्य की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। आज विश्व भूवैज्ञानिक दिवस के मौके पर उनके योगदान को याद करते हैं।
राजस्थान देश के खनिज मानचित्र में सबसे प्रमुख राज्यों में गिना जाता है। मार्बल, जिप्सम, चूना पत्थर, ग्रेनाइट और वोलास्टोनाइट जैसे खनिजों की प्रचुरता ने यहां एक मजबूत खनन आधारित अर्थव्यवस्था खड़ी की है। इन संसाधनों की खोज, आकलन और उपयोग की वैज्ञानिक प्रक्रिया में भूवैज्ञानिकों की भूमिका सबसे अहम रही है। देश के कुल मार्बल उत्पादन का करीब 90 प्रतिशत और जिप्सम का 90–95 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान से आता है। यही कारण है कि सीमेंट, स्टील और निर्माण उद्योगों की रीढ़ माने जाने वाले कच्चे माल की आपूर्ति में यह राज्य अग्रणी बना हुआ है।
आधुनिक दौर में स्मार्ट सिटी, हाइवे, बांध और बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स के लिए भी भूवैज्ञानिकों की जरूरत लगातार बढ़ रही है। किसी भी निर्माण से पहले भूमि की गुणवत्ता और स्थिरता का परीक्षण अनिवार्य हो गया है, जिससे सुरक्षित और टिकाऊ विकास सुनिश्चित किया जा सके।
हर तरह से करते हैं आकलन
भूवैज्ञानिकों का कार्य केवल खनिज खोज तक सीमित नहीं है। वे खनन क्षेत्रों का वैज्ञानिक अध्ययन कर सुनिश्चित करते हैं कि संसाधनों का दोहन संतुलित और सतत तरीके से हो। इसके साथ ही वे पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन कर भूमि पुनर्वास और भूजल संरक्षण जैसे अहम कार्यों में भी योगदान देते हैं।
उदयपुर में खनीज गतिविधियां अहम
राज्य में खनन उद्योग से लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला है। छोटे कस्बों से लेकर बड़े औद्योगिक क्षेत्रों तक, खनिज आधारित गतिविधियों ने आर्थिक विकास को गति दी है। उदयपुर, राजसमंद, भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ जैसे क्षेत्र खनिज गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं।
राजस्थान: प्रमुख खनिज और अर्थव्यवस्था को बल
देश का 90 फीसदी मार्बल उत्पादन और 95 फीसदी जिप्सम उत्पादन यहां होता है। साथ ही चूना पत्थर, ग्रेनाइट, वोलास्टोनाइट, बॉक्साइट और लौह अयस्क भी यहां के अहम खनिज है। ऐसे में सीमेंट और स्टील उद्योग को कच्चा माल, निर्माण क्षेत्र को मजबूती, लाखों लोगों को रोजगार, निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जन, स्थानीय स्तर पर उद्योगों का विकास की गतिविधियां हैं।
भूजल और जल प्रबंधन में भूमिका
देश की करीब 60 फीसदी सिंचाई भूजल पर निर्भर है। कई शहरों में 70–80 फीसदी पेयजल का स्रोत भूजल से ही है। भूजल के भंडार और उपलब्धता का आकलन भूवैज्ञानिक करते हैं। जल संकट से निपटने में वैज्ञानिक योजना तैयार करते हैं। सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल स्रोतों की पहचान में मदद करते हैं।
आपदा प्रबंधन और सुरक्षित निर्माण
भू वैज्ञानिक भूकंप, भूस्खलन और बाढ़ के जोखिम का अध्ययन, बड़े प्रोजेक्ट्स से पहले भूमि की वैज्ञानिक जांच, बांध, सुरंग, हाइवे और स्मार्ट सिटी में अहम योगदान देते हैं। साथ ही अस्थिर क्षेत्रों की पहचान कर हादसों की संभावना कम करने, आपदा पूर्व चेतावनी और जोखिम प्रबंधन में सहयोग करते हैं।-
राजस्थान की अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार इसके खनिज संसाधन हैं, और इन संसाधनों की पहचान व वैज्ञानिक उपयोग में भूवैज्ञानिकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। आज जब संसाधनों का दबाव बढ़ रहा है, तब जरूरी है कि हम सतत खनन और पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों को अपनाएं। भूवैज्ञानिक न केवल संसाधन खोजते हैं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए उनके संतुलित उपयोग की दिशा भी तय करते हैं।
डॉ. गोविंद सिंह भारद्वाज, पूर्व प्रोफेसर, सीटीएई एमपीयूएटी उदयपुर