
कोटड़ा. (उदयपुर)आदिवासी बाहुल्य कोटड़ा तहसील के ग्रामीण इलाकों में हलमा परम्परा आज भी जीवित है। आदिकाल से चली आ रही यह ऐसी परम्परा है, जिसमे आदिवासी समुदाय के आस पड़ोस के महिला एवं पुरुषों के साथ साथ युवा लोग भी खेती बाड़ी से लेकर विवाह आयोजन एवं किसी के मकान बनाने में सभी पारस्परिक रूप से मिलकर सहभागिता निभाते है। इन दिनों गेहूं काटने का काम चल रहा है। एेसे में छोटे-छोटे गांव के लोग एक साथ एक व्यक्ति के खेत में गेहूं काटते हैं। इससे इनको बड़ी मदद मिल रही है। कोटड़ा क्षेत्र में एक परिवार में करीब दो बीघा में गेहूं की फसल थी। हलमा के तहत करीब ५० लोग गेहूं कटाई के काम में लगे और चंद घंटों में काम पूरा कर दिया।
क्या है हलमा परम्परा
हलमा एक प्रकार का आदिवासियों का समूह है जो किसी की मदद के लिए एकत्रित होता है और महीनों और कई दिनों तक चलने वाला काम चंद घंटों में पूरा कर देता है। हलमा का मतलब है सभी लोगों द्वारा हिल मिल कर किया गया काम है, जिसमे खेतों की बुवाई कटाई, निराई-गुड़ाई आदि कार्य आसपास के युवक मिलजुल कर प्रतिदिन किसी एक किसान का काम निबटा देते है।ं। दूसरे दिन किसी दूसरे के खेत में सब मिलकर काम कर लेते हैं। इस दौरान सभी लोगों के खाने पीने आदि की व्यवस्था वह किसान करता है जिसके खेत में काम हो रहा है। इस प्रकार हलमा परम्परा से कुछ ही दिन में सभी किसानों के कार्य आसानी से पूरे हो जाते हैं। इस दौरान हलमा में आए व्यक्ति किसी भी प्रकार का कोई मेहनताना नही लेते हैं।