
उदयपुर. जहां बड़े शहरों में खिलाड़ी आधुनिक स्टेडियम और अत्याधुनिक सुविधाओं के बीच तैयार होते हैं, वहीं आदिवासी बहुल जावरमाइंस क्षेत्र के गांवों में बच्चे पहाड़ काटकर बनाए कच्चे मैदानों पर नंगे पैर दौड़ते हुए फुटबॉल के सपने बुन रहे हैं। मैदानों की जगह पथरीली जमीन है, सुविधा की जगह संघर्ष है, संसाधनों की कमी के बीच कुछ समर्पित शारीरिक शिक्षक जेब से खर्च कर भविष्य के खिलाड़ी गढ़ रहे हैं।
फुटबॉल विश्व कप हो या भारतीय टीम के मुकाबले, क्षेत्र के बच्चों में फुटबॉल का ऐसा जुनून है कि वे खेतों, पहाड़ियों और उबड़-खाबड़ मैदानों को ही अपना स्टेडियम बना लेते हैं। रोनाल्डो, मैसी, लुइस सुवारेज, किलियन एम्बाप्पे और सुनील छेत्री इनके आदर्श हैं। यही जुनून आज जावरमाइंस से 20-25 किलोमीटर के दायरे में बसे कई गांवों को फुटबॉल की नई नर्सरी बना रहा है।
पहाड़ काटकर बनाया मैदान, पांच साल से मुफ्त प्रशिक्षण
जावरमाइंस क्षेत्र के रवा गांव में बच्चों ने सपनों के लिए खुद ही रास्ता बनाया। गांव के युवाओं और बच्चों ने पहाड़ियों के बीच स्थित पथरीली जमीन को समतल कर फुटबॉल मैदान तैयार किया। यह मैदान स्कूल से करीब डेढ़ किमी दूर है, जहां रोज शाम बच्चों की सीटी और फुटबॉल की आवाज गूंजती है। राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय रवा के शारीरिक शिक्षक मांगीलाल मीणा पांच वर्षों से निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। खुद फुटबॉल खिलाड़ी और एनआइएस प्रशिक्षित मांगीलाल मीणा स्कूल की छुट्टी के बाद 20 किमी की दूरी तय कर गांव पहुंचते हैं और बच्चों को नियमित प्रशिक्षण देते हैं। शुरुआत में बच्चों के पास फुटबॉल तक नहीं थी। कई बच्चे नंगे पैर खेलते थे। तब शिक्षक ने स्वयं फुटबॉल खरीदकर दी, जूतों की व्यवस्था की और जरूरतमंद बच्चों को खेल सामग्री उपलब्ध करवाई।
आज इसका परिणाम है कि 120 से अधिक बच्चे जिला स्तर तक पहुंच चुके हैं, 15 खिलाड़ी राज्य स्तर पर खेल चुके हैं और कुछ खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय शिविर तक में जगह बनाई है। गर्मी की छुट्टियां हों या अन्य अवकाश, रवा गांव में फुटबॉल की प्रैक्टिस जारी रहती है। विशेष प्रशिक्षण शिविर लगाए जाते हैं, जहां लड़के और लड़कियां दोनों समान उत्साह से भाग लेते हैं। वर्तमान में करीब 15 से 20 खिलाड़ी नियमित अभ्यास कर रहे हैं।
रेला गांव जहां छोटे मैदान से निकले राष्ट्रीय खिलाड़ी
जावरमाइंस क्षेत्र के रेला गांव की कहानी भी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। यहां राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में कार्यरत शारीरिक शिक्षक फिरोज खान पठान वर्षों से फुटबॉल प्रतिभाओं को तराश रहे हैं। रेला गांव पहाड़ियों के बीच बसा है और यहां खेल मैदान जैसी कोई बड़ी सुविधा नहीं है। स्कूल परिसर में छोटी और उबड़-खाबड़ जगह पर ही खिलाड़ी तैयार किए जाते हैं। इसके बावजूद यहां से 7 से 8 खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुके हैं। सलूम्बर जिले की अंडर-14 वर्ग की एकमात्र राष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी निरमा मीणा भी इसी क्षेत्र की देन हैं। फिरोज खान खुद फुटबॉल खिलाड़ी रहे हैं और आर्थिक कमजोर बच्चों के लिए फुटबॉल, किट और अन्य आवश्यक सामग्री की व्यवस्था भी अपने स्तर पर करते हैं।
पाड़ला गांव बना फुटबॉल प्रतिभाओं की खान
क्षेत्र का पाड़ला गांव तो मानो फुटबॉल खिलाड़ियों की फैक्ट्री बन चुका है। शारीरिक शिक्षक खान की ओर से तैयार यहां से अब तक 60 से 70 खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर अंडर-14 प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके हैं। गांवों के छोटे-छोटे मैदान, खेतों और खाली जगहें ही इन खिलाड़ियों की अभ्यास स्थली है।
जरूरत सिर्फ थोड़े से सहयोग और संसाधनों की
जावरमाइंस क्षेत्र में फुटबॉल का बढ़ता जुनून और खिलाड़ियों की उपलब्धियां साबित करती हैं कि यदि इन गांवों को बेहतर मैदान, खेल सामग्री और प्रशिक्षण सुविधाएं मिल जाएं तो यहां से राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी निकल सकते हैं। आज भी कई बच्चे नंगे पैर या सीमित संसाधनों में अभ्यास कर रहे हैं। कई शिक्षक स्वयं के खर्च पर खिलाड़ियों को आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसे में जरूरत है कि प्रशासन, खेल विभाग, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संस्थाएं इन प्रतिभाओं की ओर ध्यान दें।