यूरोप एवं सेंट्रल एशिया से आने वाला खूबसूरत पक्षी है ग्रेलैग गूज़
उदयपुर . सर्दियों की दस्तक के साथ ही यह लंबी दूरी के प्रवासी पक्षी ग्रेलैग गूज़ लगभग पांच से दस हज़ार किलोमीटर का सफर तय कऱ इनके परियावास से अपेक्षाकृत गर्म इलाकों की तरफ भोजन इत्यादी के लिए प्रवास करते हैं । पक्षी विशेषज्ञ अनिल रोजर्स ने बताया कि सर्दियों के दौरान विभिन्न जलाशयों के आस पास इनको बड़ी संख्या में देखा जा सकता है, यह बड़े ही सतर्क एवं शर्मीले होते हैं जरा सी आहट पर भी इनका झुण्ड एकदम उड़ जाता है । पक्षी विशेषज्ञ डाॅ. अनिल त्रिपाठी ने बताया कि यह पक्षी सारस क्रेन की तरह पूर्ण जीवनकाल के लिए जोड़ा बनाता है एवं माता पिता दोनों मिलकर उनके बच्चों की परवरिश करते हैं । उन्होंनें बताया कि यह दो से पांच तक अण्डे देते हैं जिनमें से एक या दो बच्चे ही पूर्ण रूप से बड़े हो पाते हैं । ग्रेलैग के बारे में सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला प्रश्न होता है कि इनका नाम गे्र्रलैग है पर इनके पैर तो गुलाबी होते हैं इसपर रोजर्स एवं डाॅ. त्रिपाठी ने बताया कि इनके नाम का इनके पैरों से कोई लेना देना नहीं है, अंग्रेजी में इनका नाम ग्रे (एल.ए.जी. अक्षरों से लिखा जाता है जिसका मतलब लैग यानी पीछे) अर्थात इनके पिछले हिस्से का रंग ग्रे है जबकि अंग्रेजी में (एल.ई.जी का मतलब होता है लेग यानी पैर)। इन्हें प्रचिलित भाषा में राजहंस भी कहा जाता है जबकी हंस विशेष तौर पर स्वान पक्षी के लिए उपयोग किया जाता है जो यहां नहीं मिलता । इनकी गुलाबी रंग की चैंच एवं पैर एवं सफेद काली पूंछ इनकी विशेष पहचान होती है ।
शेलडक की रहती है पैनी नजर , जरा सी आहट से अन्य को कर देता है सतर्क
उदयपुर. दक्षिण पूर्वी यूरोप, सेंट्रल एशिया, तिब्बत, चीन व मंगोलिया से आने वाला ब्राह्मिणी डक (शेलडक) सबसे पहले पहुंचने वाले प्रवासी पक्षियों में से एक है। सर्दी की दस्तक के साथ ही लंबी दूरी के पक्षी भारत के विभिन्न जलाशयों की ओर प्रवास करना शुरू कर देते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार भारत के सुदूर उत्तरी इलाके भी इनकी ब्रीडिंग रेंज है। इनकी कोर-कोर की आवाज को बहुत दूर से सुना जा सकता है। ये बड़े ही सतर्क होते हैं और खतरों पर पैनी नजर रखते हैं। जरा सी आहट पर इनका समूह शोर मचाते हुए उड़ जाता है, जिससे दूसरे पक्षी भी सतर्क हो जाते हैं। यह पक्षी रात्रि में भोजन करना पसंद करता है। छोटे कीडों से लेकर मछली व मेढक़ के अलावा खेत में उगे छोटे पौधे भी बड़े चाव से खाता है। इनका सफेद-केसरिया रंग एवं काली पूंछ विशेष पहचान होती है।