
उदयपुर.दिव्यांगों के लिए समान, सम्मानजनक, स्वतंत्र और बाधामुक्त बैंकिंग सेवाओं की मांग न्यायालय तक पहुंच गई। पैनासियाडिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स के अध्यक्ष और दिव्यांग अधिकार कार्यकर्ता डॉ. अरविंदर सिंह ने एचडीएफसी बैंक लिमिटेड एवं संबंधित अधिकारियों पर सिविल न्यायालय में वाद दायर किया। कोर्ट ने संबंधित पक्षों को समन जारी किए हैं। दिव्यांगजनों के समान बैंकिंग अधिकार और संस्थागत सुगम्यता से जुड़ा है।
यह है मामला
अर्थ डायग्नोस्टिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अरविंदर सिंह दिव्यांगजन हैं। उन्होंने एचडीएफसी बैंक शाखा में स्वतंत्र रूप से प्रवेश करने, बैंकिंग सेवा का उपयोग करने तथा लॉकर तक सुविधाजनक पहुंच से संबंधित समस्या उठाई। बैंक को ई-मेल एवं अन्य माध्यम से रैंप, सुलभ लॉकर तथा दिव्यांगजन अनुकूल व्यवस्था उपलब्ध कराने का आग्रह किया। बैंक ने वैकल्पिक रूप से खाता अन्य शाखा में स्थानांतरित करने का विकल्प बताया। इसके बाद डॉ. अरविंदर सिंह ने कोर्ट की शरण ली। दायर वाद में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के साथ भारतीय रिजर्व बैंक के बैंकिंग सेवाओं में सुगम्यता से संबंधित दिशा-निर्देशों एवं प्रावधानों का संदर्भ दिया है।
आरबीआइ दे चुका है निर्देश
आरबीआइ ने बैंक शाखाओं और एटीएम तक दिव्यांगों एवं व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं की सुगम पहुंच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने, प्रवेश द्वारों पर रैंप जैसी व्यवस्था तथा अनुपालन की समीक्षा करने पर जोर दिया। आरबीआइ के 2025 के कमर्शियल बैंक-रेस्पॉन्सिबल बिजनेस कंडेक्टडाइरेक्शन्स में भी फाइनेंशियल इन्क्लुजन एंड एसेसिबिलिटी को बैंकिंग उत्तरदायित्व के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में शामिल किया है।
एक्सेसिबिलिट ऑडिट कराएं बैंक
पैनासियाडिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स ने कहा कि बैंक में खाते की अनुमति ही समान बैंकिंग नहीं है। कोई व्यक्ति शाखा में स्वतंत्र रूप से प्रवेश नहीं कर सकता, काउंटर या लॉकर तक नहीं पहुंच सकता या हर कदम पर मदद लेनी पड़ती है, तो वास्तविक वित्तीय समावेशन अधूरा है। बैंकिंग संस्थाएं शाखाओं का एक्सेसिबिलिटी ऑडिट कराएं। रैंप, सुलभ काउंटर, लॉकर, शौचालय, संकेतक और डिजिटल सेवाओं की समीक्षा करें। कर्मचारियों को दिव्यांगजन-संवेदनशीलता का प्रशिक्षण दें।
यह लड़ाई किसी बैंक के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस सोच और व्यवस्था में बदलाव के लिए है, जिसमें दिव्यांग व्यक्ति को सुविधा उपलब्ध कराने के बजाय उसे स्वयं स्थान या व्यवहार बदलने के लिए कहा जाता है। सुगम्यता विशेष कृपा नहीं, बल्कि समानता, गरिमा और स्वतंत्रता का अधिकार है। राइट्स ऑफ़ पर्सन विद डिसेबिलिटी एक्ट 2016 में इसके स्पष्ट कानून है और अवहेलना की स्थिति में दंडात्मक प्रावधान भी है।
डॉ. अरविंदर सिंह, दिव्यांगजन कार्यकर्ता