
धीरेन्द्र जोशी/उदयपुर.जिले की भीण्डर तहसील में ग्राम वासियों, किसानों और वैज्ञानिकों की सम्मिलित सहभागिता से हुए भूजल प्रबंधन का मारवी मोडल केंद्र सरकार की छह हजार करोड़ की अटल भूजल योजना में अपनाया जाएगा।क्षेत्र के हीन्ता व धारता गांवों में इस परियोजना की गतिविधियों को देखने के बाद जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त सचिव अखिल कुमार ने भी इस योजना की सराहना की। उन्होंने ग्रामवासी भूजल जानकारों तथा भूजल सहकारी समिति के सदस्यों से विचार-विमर्श कर भूजल पूनर्भरण संरचनाओं तथा चेकडेम द्वारा भूजल पुनर्भरण के ढांचों का निरीक्षण किया।उल्लेखनीय है कि महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, विद्या भवन कृषि विज्ञान केन्द्र, उदयपुर एवं वेस्र्टन सिडऩी विश्वविद्यालय, आस्ट्रेलिया द्वारा आस्ट्रेलियन सेन्टर फोर इन्टरनेशनल एग्रीकल्चर रिसर्च के सहयोग से सहभागिता आधारित भूजल प्रबंधन योजना (मारवी), उदयपुर जिले के धारता जलग्रहण क्षेत्र के पांच गांवों में तथा गुजरात के छह गांवों में चल रही है।अखिल कुमार परियोजना क्षेत्र में लगाये गये बारिशए हवा तथा दैनिक तापक्रम मापने वाले स्वचालित मौसम सूचना यंत्र और भूजल जानकारों द्वारा लिये गये क्षेत्र के 250 कुओं के साप्ताहिक जलस्तर के आंकड़े भी देखे।परियोजना में तकनीकी मार्गदर्शन दे रहे, सेवानिवृत अधीक्षण अभियन्ता मदन छाजेड़, शोध कर्ता प्रह्लाद सोनी ने संयुक्त सचिव को बताया कि इस योजना से हींता में एक कुएं में 21 हजार लीटर वर्षा जल के पूनर्भरण की जानकारी दी। गांव बरनी में एक लाख अस्सी हजार लीटर तथा धारता में अ_ारह हजार लीटर पानी का पूनर्भरण किया गया। सीटीएइ के प्रोफेसर डॉ. पीके सिंह, योगिता दशोरा, प्रवीण पाटील एवं सभी ग्राम भूजल जानकार, भूजल सहकारी समिति सदस्य उपस्थित थे।
क्या है मारवी योजना
मारवी योजना ग्राम समुदाय की सहभागिता से भूजल पुनर्भरण एवं प्रबंधन की योजना है। आस्ट्रेलिया सेन्टर फोर इन्टरनेशनल एग्रीकल्चर रिसर्च (एसीआईएआर) के वित्तीय सहयोग से वर्ष 2012 में प्रारंभ हुई। इस योजना के तहत साझेदार संस्थाओं एवं अलग-अलग विषयों, विधाओं, संस्थाओं के 30 प्रमुख वैज्ञानिक तथा 35 ग्राम वैज्ञानिकों (भूजल जानकार) ने सहभागिता की। योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामवासी किसान साथियों की सहभागिता से ऐसी विधियों, तरीकों व साधनों का विकास करना है, जिससे कि सहयोग, समन्वय एवं वैज्ञानिक सोच के साथ ग्रामवासी स्वयं के स्तर पर भूजल का प्रबंधन कर सकें।