
उदयपुर. अस्पताल के मुर्दाघर का नाम सुनते ही अधिकांश लोग सहम जाते हैं। वहां कुछ मिनट ठहरना भी आसान नहीं होता। लेकिन, उदयपुर के दो लोग ऐसे हैं, जिन्होंने वर्षों से मौत, दर्द और चीख-पुकार के बीच अपने जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य खोज लिया है। मुर्दाघर में पोस्टमार्टम के लिए चिकित्सकों के सहायक रोशन लाल वाल्मीकि और सुरेश छापरवाल के लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि शोकाकुल परिवारों की पीड़ा कम करने का एक मौन संकल्प है।
एमबी अस्पताल के मुर्दाघर में पिछले 17 वर्षों से रोशन लाल वाल्मीकि और 11 वर्षों से सुरेश छापरवाल चिकित्सकों के सहायक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। दोनों की ड्यूटी उस जगह होती है, जहां हर दिन किसी न किसी परिवार का सबसे बड़ा दुख पहुंचता है। पोस्टमार्टम प्रक्रिया में चिकित्सकों का सहयोग करना, शवों को तैयार करना और आवश्यक व्यवस्थाएं संभालना उनकी जिम्मेदारी है।
संवेदनशीलता के साथ निभा रहे जिम्मा
दोनों बताते हैं कि जब पहली बार इस काम की शुरुआत की थी तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि हर दिन शवों के बीच काम करना पड़ेगा। शुरुआती दिनों में सड़े-गले या क्षत-विक्षत शवों को देखकर खाना तक नहीं खा पाते थे। कई बार रातभर वही दृश्य आंखों के सामने घूमते रहते थे। धीरे-धीरे परिस्थितियों ने उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाया और आज वे पूरी संवेदनशीलता के साथ अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
यहां का वातावरण भी चुनौती
मुर्दाघर की सबसे बड़ी चुनौती केवल शव नहीं, बल्कि वहां का वातावरण भी होता है। कई बार दुर्गंध इतनी अधिक होती है कि वहां कुछ देर खड़ा रहना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे समय वे अगरबत्तियां जलाते हैं, इत्र का छिड़काव करते हैं और फिर काम में जुट जाते हैं। दुर्घटनाओं या बड़े हादसों के दौरान जब एक साथ कई शव पहुंचते हैं तो सुबह से शाम तक उन्हें बैठने तक का समय नहीं मिलता। लेकिन, उनके काम की असली ताकत संवेदना है। दोनों कहते हैं कि जब भी किसी का शव सामने होता है तो उनके मन में सबसे पहले उस परिवार का खयाल आता है, जिसने अपना कोई अपना खोया है। उन्हें लगता है कि गांव या मोहल्ले में मातम पसरा होगा, घरों के चूल्हे नहीं जले होंगे और परिजन अंतिम दर्शन के इंतजार में होंगे। यही सोच उन्हें हर पोस्टमार्टम जल्द और व्यवस्थित ढंग से पूरा करने की प्रेरणा देती है, ताकि शव शीघ्र परिजन को सौंपा जा सके।
कई बार विचलित हो जाता मन
सबसे कठिन पल तब आते हैं, जब नवजात या छोटे बच्चों के शव पोस्टमार्टम के लिए पहुंचते हैं। बाहर बिलखती मां और परिजन की चीखें उनके मन को झकझोर देती हैं। वे कहते हैं कि ऐसे समय शब्द साथ नहीं देते, लेकिन मन भीतर तक विचलित हो जाता है। फिर भी वे अपने भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए कर्तव्य निभाते हैं।
विदा होते व्यक्ति के प्रति सम्मान का भाव
रोशन और सुरेश मानते हैं कि मुर्दाघर का उनका काम केवल सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि मानवता की सेवा है। उनका कहना है कि हर व्यक्ति समाज से कुछ लेकर जाता है, लेकिन यदि वे किसी दिवंगत की देह को सम्मानपूर्वक अंतिम यात्रा तक पहुंचाने में अपना योगदान दे सकें, तो यही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।