
उदयपुर. पशुओं से इंसानों में फैलने वाले संक्रामक रोगों को लेकर पूरी दुनिया में चिंता बढ़ रही है, लेकिन राहत की बात यह है कि समय पर जागरूकता, नियमित टीकाकरण और वन हेल्थ मॉडल को अपनाकर इन बीमारियों पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। विश्व जूनोसिस दिवस के अवसर पर स्वास्थ्य और पशु चिकित्सा विशेषज्ञों ने कहा यदि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़कर काम किया जाए तो रेबीज, ब्रुसेलोसिस, बर्ड फ्लू और अन्य जूनोटिक रोगों के खतरे को काफी कम किया जा सकता है।
बढ़ रही जागरूकता, रोकथाम पर विशेष फोकस
जिले में पशुपालन, डेयरी और पोल्ट्री गतिविधियां बड़े स्तर पर होती हैं। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग और पशुपालन विभाग समय-समय पर टीकाकरण, जागरूकता और निगरानी अभियान संचालित कर रहे हैं। लोगों में बढ़ती जागरूकता और समय पर उपचार की प्रवृत्ति पहले की तुलना में बेहतर हुई है, जिससे गंभीर संक्रमणों की रोकथाम में मदद मिल रही है।
वन हेल्थ क्यों है भविष्य का मॉडल
पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ हेमंत जोशी के अनुसार इंसान, पशु और पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि पशु स्वस्थ रहेंगे, पर्यावरण स्वच्छ रहेगा और लोगों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता होगी तो संक्रमण फैलने की संभावना स्वतः कम हो जाएगी। इसी सोच पर आधारित ‘वनहेल्थ’ मॉडल आज पूरी दुनिया में अपनाया जा रहा है और भारत में भी इसे प्राथमिकता दी जा रही है।
रेबीज से बचाव पूरी तरह संभव
स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ अशोक आदित्य का कहना है रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी भी समय पर इलाज मिलने पर पूरी तरह रोकी जा सकती है। किसी पशु के काटने पर घाव को तुरंत साबुन और बहते पानी से धोना तथा बिना देरी किए एंटी-रेबीज वैक्सीन लगवाना सबसे प्रभावी उपाय है। पालतू कुत्तों और बिल्लियों का नियमित टीकाकरण भी संक्रमण की श्रृंखलातोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
छोटी सावधानियां, बड़ा बचाव
बिना उबला दूध या दूषित पशु उत्पादों का सेवन नहीं करना, बीमार पशुओं से दूरी रखना, पशुपालन कार्य के दौरान सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करना और व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना कई ज़ूनोटिक रोगों से बचाव का आसान तरीका है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ने से भी संक्रमण के मामलों को कम करने में मदद मिल रही है।
जागरूकता ही सबसे बड़ी वैक्सीन
विशेषज्ञों की अपील है हर व्यक्ति अपने पालतू पशुओं का समय पर टीकाकरण कराए, स्वच्छता अपनाए और किसी भी संदिग्ध संक्रमण की स्थिति में तुरंत चिकित्सकीय सलाह ले। छोटी-छोटी सावधानियां न केवल व्यक्ति बल्कि पूरे समाज को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है ज़ूनोसिस?
तथ्य आंकड़ा
दुनिया में ज्ञात संक्रामक रोग 60% पशुओं से जुड़े
उभरने वाले नए संक्रामक रोग 75% पशु मूल के
हर वर्ष रेबीज से वैश्विक मौतें करीब 59,000
भारत में रेबीज से मौतें लगभग 18- 20 हजार/वर्ष (अनुमानित)
पशु काटने के बाद घाव धोने का समय तुरंत, कम से कम 15 मिनट
उदयपुर में क्यों जरूरी है सतर्कता?
- जिले में बड़ी संख्या में डेयरी और पशुपालन गतिविधियां
- शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पालतू मवेशी और श्वानों की मौजूदगी
- पशुपालक, डेयरी संचालक, पोल्ट्री कर्मी, पशु चिकित्सक और सफाईकर्मी उच्च जोखिम समूह
- बारिश के मौसम में संक्रमण फैलने की संभावना अधिक रहती है
प्रमुख जूनोटिक रोग और बचाव
रोग कैसे फैलता है बचाव
रेबीज कुत्ता, बिल्ली, बंदर के काटने से एंटी-रेबीज वैक्सीन
ब्रुसेलोसिस संक्रमित पशु, कच्चा दूध उबला दूध, पशु जांच
बर्ड फ्लू संक्रमित पक्षी स्वच्छता और निगरानी
लेप्टोस्पायरोसिस दूषित पानी साफ पानी का उपयोग
स्क्रबटाइफस संक्रमित माइट्सझाड़ियों से बचाव
ज़ूनोटिक रोगों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका जागरूकता और समय पर उपचार है। पशु के काटने पर तुरंत घाव धोकर एंटी-रेबीज वैक्सीन अवश्य लगवाएं। वन हेल्थ मॉडल को अपनाकर पशु, मानव और पर्यावरण के समन्वय से संक्रमण की रोकथाम संभव है।
डॉ. अशोक आदित्य, सीएमएचओ, उदयपुर