उदयपुर

उदयपुर . ‘रिफ्यूज्ड’ हो रहा कानून: उदयपुर के थानों में रजिस्टर्ड-स्पीड पोस्ट को नो एंट्री…लौट रहे वारंट

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार डाक स्वीकार करने से इनकार करना नियमों के विपरीत है, जिससे शिकायतकर्ताओं की न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
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Jul 12, 2026
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हिरणमगरी थाने से लौटाया लिफाफा

दयपुर. यदि पुलिस थाना ही रजिस्टर्ड और स्पीड पोस्ट लेने से इनकार कर दे तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे? शहर के कई थानों में पिछले कई दिन से ऐसा ही हो रहा है। डाक विभाग के कर्मचारी जब शिकायतें, नोटिस, न्यायालय से जुड़े दस्तावेज या अन्य सरकारी पत्र लेकर पहुंचते हैं तो वहां पहले लिफाफे और भेजने वाले की जानकारी देखी जाती है। इसके बाद कई मामलों में डाक लेने से मना कर दिया जाता है। इस कारण शिकायतें और महत्वपूर्ण दस्तावेज रिफ्यूज्ड या डाक लेने से मना किया कि टिप्पणी के साथ भेजने वाले के पास लौट रहे हैं।

थानों तक पहुंचने वाली डाक केवल शिकायतों तक सीमित नहीं होती। कोर्ट के समन, वारंट, ट्रिब्यूनल के नोटिस, अधिवक्ताओं के कानूनी पत्राचार, सरकारी विभागों के आदेश और वैधानिक दस्तावेज भी डाक विभाग के माध्यम से ही पहुंचाए जाते हैं। इसके बावजूद कई थानों में लिफाफा देखकर यह तय किया जाता है कि भेजने वाला कौन है। यदि उसमें परिवाद या कानूनी शिकायत होने की आशंका होती है तो डाक लेने से ही इनकार कर दिया जाता है। कई बार लिफाफा खोलकर या उसके स्वरूप को देखकर भी उसे लौटा दिया जाता है।

डाकिए से भी आरोपी जैसा व्यवहार

डाक विभाग के कर्मचारियों का कहना है कि थानों में डाक वितरण के दौरान कई बार उनसे ऐसा व्यवहार किया जाता है, मानो वे कोई अपराधी हों। उधर, डाकिए भी बहस के बजाय डाक वापस ले जाना ही उचित समझते हैं। डाक विभाग में ऐसे अनेक रजिस्टर्ड और स्पीड पोस्ट लिफाफे अलग रखे जाते हैं, जिन पर टिप्पणी अंकित होती है। ये लिफाफे अंततः प्रेषक को भेज दिए जाते हैं। इसका बड़ा नुकसान उस व्यक्ति को होता है, जिसने कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए अपनी शिकायत या दस्तावेज डाक से भेजे थे।

इनकार करने का अधिकार ही नहीं

- कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी थाने को रजिस्टर्ड या स्पीड पोस्ट लेने से इनकार करने का अधिकार नहीं है। पुलिस एक्ट 1861 एवं पुलिस मैन्युअल के अनुसार प्रत्येक थाने में डाक रजिस्टर संधारित किया जाना आवश्यक है, जिसमें प्राप्त होने वाली प्रत्येक सरकारी और निजी डाक का रिकॉर्ड दर्ज किया जाता है।

- दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 154 के तहत यदि डाक के माध्यम से किसी संज्ञेय अपराध की सूचना प्राप्त होती है तो उस पर आवश्यक कार्रवाई करना पुलिस का दायित्व है।

- सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) के निर्णय में भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफआइआर दर्ज करना अनिवार्य माना गया है। ऐसे में शिकायत वाली डाक स्वीकार नहीं करना न्यायिक आदेशों की भावना के विपरीत माना जा सकता है।

क्या कर सकता परिवादी?

यदि थाना डाक लेने से इनकार करता है तो डाकिए से लिफाफे पर रिफ्यूज्ड या डाक लेने से मना किया लिखवाकर हस्ताक्षर और तारीख अंकित कराना महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है। इसके बाद शिकायतकर्ता पुलिस अधीक्षक को पूरी जानकारी और डाक की प्रतिलिपि भेज सकता है। आवश्यकता पड़ने पर उच्च पुलिस अधिकारियों को शिकायत भेज सकता है। ऑनलाइन पुलिस शिकायत पोर्टल या हेल्पलाइन के माध्यम से शिकायत दर्ज करा सकता है। कार्रवाई नहीं होने पर सक्षम न्यायालय में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत आवेदन प्रस्तुत कर सकता है।

विभागीय नियमों के तहत प्रत्येक रजिस्टर्ड अथवा स्पीड पोस्ट तय पते पर पहुंचाई जाती है। यदि संबंधित व्यक्ति या कार्यालय डाक लेने से इनकार करता है, तो पोस्टमैन लिफाफे पर रिफ्यूज्ड का उल्लेख कर उसे नियमानुसार प्रेषक को भेज देता है।

अक्षय गाडेकर, प्रवर अधीक्षक डाकघर

Updated on:
12 Jul 2026 05:53 pm
Published on:
12 Jul 2026 05:53 pm