उदयपुर

वैश्विक संकट की पहली गाज मजदूरों पर, उदयपुर के फेल्सपार उद्योग में सन्नाटा, 1500 से अधिक बेरोजगार

इजराइल-ईरान युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर गैस सप्लाई बाधित हुई, जिसका सीधा असर गुजरात के मोरबी स्थित टाइल्स उद्योग पर पड़ा। मोरबी की इंडस्ट्री उदयपुर के 'सोडा फेल्सपार' पाउडर पर निर्भर है। असर: 6 मार्च को मोरबी में उत्पादन बंद हुआ और उसके अगले ही दिन उदयपुर के गुडली, चंदेसरा, मीठा नीम और गोड़ा घाटी इंडस्ट्रियल जोन की यूनिट्स ने काम बंद कर दिया। त्वरित छंटनी: मैनेजमेंट ने बिना किसी पूर्व सूचना या 'वेटिंग पीरियड' के, उत्पादन रुकने के अगले ही दिन मजदूरों को काम से हटा दिया।

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May 01, 2026
source patrika photo

मजदूर दिवस विशेष : रोटी को मजबूर 1500 से ज्यादा मजदूर

उदयपुर. विकसित भारत की सबसे मजबूत कड़ी मजदूर आज अपने सबसे नाजुक दौर से गुजर रहा है। विडंबना है कि उद्योग जब ऊंचाइयों पर होते हैं तो मुनाफे में मजदूर की हिस्सेदारी तय नहीं होती पर मंदी या वैश्विक संकट में छंटनी का पहला शिकार मजदूर ही बनता है। उदयपुर के गुडली इंडस्ट्रियल एरिया सहित आसपास में यही स्थिति देखने को मिल रही है।मोरबी में गैस संकट और उदयपुर में तालाबंदी

इजराइल-ईरान युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर गैस सप्लाई बाधित हुई, जिसका सीधा असर गुजरात के मोरबी स्थित टाइल्स उद्योग पर पड़ा। मोरबी की इंडस्ट्री उदयपुर के 'सोडा फेल्सपार' पाउडर पर निर्भर है।असर: 6 मार्च को मोरबी में उत्पादन बंद हुआ और उसके अगले ही दिन उदयपुर के गुडली, चंदेसरा, मीठा नीम और गोड़ा घाटी इंडस्ट्रियल जोन की यूनिट्स ने काम बंद कर दिया।

त्वरित छंटनी

मैनेजमेंट ने बिना किसी पूर्व सूचना या 'वेटिंग पीरियड' के, उत्पादन रुकने के अगले ही दिन मजदूरों को काम से हटा दिया।
इन 70 से अधिक इकाइयों में करीब 1500 से ज्यादा मजदूर कार्यरत थे, जो रातों-रात बेरोजगार हो गए। इसके अलावा ये यूनिट्स जिन खदानों से मिनरल्स मंगाती थी, वहां काम करने वाले माइन्स लेबर भी बेरोजगार हो गए। ये संख्या बहुत ज्यादा पहुंचेगी, क्योंकि अधिकतर माइन्स भी बंद पड़ी है।

पलायन और शिक्षा पर प्रभाव

गुडली मजदूर यूनियन के अध्यक्ष विजय सिंह के अनुसार, काम बंद होने और एडवांस भुगतान न मिलने के कारण मजदूरों के सामने रोटी का संकट खड़ा हो गया है।पलायन: किराया देने और राशन जुटाने में असमर्थ सैकड़ों मजदूर सपरिवार अपने गांवों की ओर लौट गए हैं।

शिक्षा का नुकसान

आर्थिक तंगी के चलते मजदूरों को बीच सत्र में ही स्कूलों से बच्चों के नाम कटवाने पड़े हैं।अनिश्चितता: जो इकाइयां कम क्षमता पर चल रही थीं, वहां के मजदूर भी इस डर से गांव लौट गए हैं कि उनकी यूनिट भी कभी भी बंद हो सकती है।

राहत पैकेज और नीतिगत बदलाव की मांग

जब भी कोई वैश्विक या प्राकृतिक संकट आता है तो सबसे कमजोर कड़ी यानी मजदूर पर ही गाज गिरती है। कोरोना काल के बाद यह दूसरा बड़ा संकट है। जिस तरह कोरोना काल में आर्थिक मदद दी थी, उसी तर्ज पर इन बेरोजगार श्रमिकों के लिए तुरंत राहत पैकेज जारी किया जाए। नए लेबर कोड जैसे कानूनों पर पुनर्विचार की जरूरत है, क्योंकि ये श्रमिकों को सुरक्षा देने के बजाय और अधिक असुरक्षित बना रहे हैं। देश की जीडीपी में योगदान देने वाले इन हाथों को आज पसीने की सही कीमत और संरक्षण की दरकार है।

जगदीश राज श्रीमाली, मजदूर नेता

Published on:
01 May 2026 05:54 pm
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