
उदयपुर . प्रकृति ने हमें विरासत में इतना कुछ दिया कि हम उसका महत्व ही नहीं समझ पाए और दोहन करने में लगे रहे। इस असंतुलन का असर धीरे-धीरे सामने आने लगा है और आने वाली पीढिय़ों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। अरावली उपत्यकाओं को छलनी करने में हमने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी तो जंगल को तबाह करने में भी हमारा कोई सानी नहीं। कुल मिलाकर पूरा पारिस्थिकी तंत्र ही बिगड़ जाने से जैव विविधता का ताना-बाना बुरी तरह प्रभावित हुआ। विश्व जैव विविधता दिवस पर जरूरत इस बात की है कि हम प्रकृति प्रदत्त विरासत को न केवल सहेजें वरन नई पीढ़ी को भी पर्यावरण संतुलन के लिए प्रेरित करें।
जैव विविधता को बनाए रखने के लिए हालांकि कई योजनाएं भी बनी, लेकिन उदयपुर में प्रकृति शुरू से महरबान रही है। बात चाहे जंगल की करें, अरावली पहाडिय़ों या फिर झीलों की करें। एक से बढकऱ एक उपहार हमें प्रकृति ने सौंप रखे हैं। जरूरत है उनको सहेजने और संरक्षण की। पेड़-पौधे, अनेक प्रकार के जीव-जंतु, मिट्टी, हवा, पानी, पहाड़, नदियां और जंगल। इनकी सार-संभाल हम सभी को मिलकर करनी होगी। जंगल व पहाड़ की बर्बादी से उस क्षेत्र विशेष की जैव विविधता को भारी नुकसान
पहुंचा है।
अरावली की वादियां हुई तहस-नहस
पहाडिय़ों के बीच गुजरते सर्पिलाकार रास्तों से गुजरते ही यहां आने वाले को उदयपुर में प्रवेश का आभास हो जाता है। यहां आने वालों का मन तब रोता है तब पहाड़ों को नुकसान पहुंचाती तस्वीरें देखने को मिलती है। उदयपुर में देबारी, डाकनकोटड़ा, बलीचा, एकलिंगजी या नाई क्षेत्र से प्रवेश करने पर पहाडिय़ों की बर्बादी का मंजर किसी से छिपा नहीं है। यही नहीं पहाडिय़ों से हरियाली नदारद है। केवल मानसून के दौरान ये पहाडिय़ां हरितिमा की चादर ओढ़ती हैं। मौसम बदलते ही फिर पहाड़ वीरान हो जाते हैं।
गुलाबबाग आने वालों पर्यटकों के मन में टीस
शहर के मध्य स्थित सबसे बड़े ऑक्सीजन पॉकेट गुलाबबाग की तस्वीर भी कुछ ठीक नहीं है। गुलाबबाग में सुबह-शाम घूमने आने वालों की मानें तो महाराणाओं के समय विकसित इस बाग जैसा कोई नया बाग तो उदयपुर नहीं दे सका, लेकिन इसकी सार-संभाल भी ठीक से नहीं कर पाए है। वरिष्ठजन कहते हैं कि बाग में पेड़-पौधे सूख रहे हैं। छाया और फल देने वाले पेड़ खत्म हो चुके हैं। सर्वविदित है कि गुलाबबाग में कभी औषधीय पौधे बहुतायत में पाए जाते थे। आज वे विलुप्त हो चुके हैं। हालांकि नगर निगम ने गुलाबबाग को अपने हाथ में ले रखा है लेकिन इसकी सार-संभाल वैसी नहीं हो रही है।
जंगल समृद्ध, हाइवे किनारे हरियाली नदारद
जंगल को समृद्ध करने के लिए उदयपुर में जनप्रतिनिधियों ने बजट देना तो शुरू किया, लेकिन जंगल और हरियाली में इजाफा कम ही देखने को मिलता है। उदयपुर-अहमदाबाद, उदयपुर-मंगलवाड़, उदयपुर-नाथद्वारा और उदयपुर-पिंडवाड़ा हाइवे बनाया गया तब बड़ी संख्या में हरे पेड़ों को काट दिया गया। लेकिन उसके बदले आज तक इन हाइवे पर हरियाली कायम नहीं हो सकी। हमने इस जैव विविधता पर कुल्हाड़ी तो चला दी,लेकिन वापस वैसी हरियाली लाने का सपना पूरा नहीं किया। हाइवे पर पेड़ लगाने की बातें कागजों में तो खूब हुई लेकिन सच्चाई यह है कि दोनों किनारों पर दूर-दूर तक पेड़ नजर नहीं आते।