उदयपुर

विश्व थैलेसीमिया दिवस विशेष: जानिए क्या है थैलेसीमिया और भारत में इसकी रोकथाम की क्या हैं योजना

वंशानुगत बीमारी थैलेसीमिया का कोई कारगर इलाज अब तक विकसित नहीं हुआ है।
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Updated: 7 May 2018, 1:48 PM IST
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वंशानुगत बीमारी थैलेसीमिया का कोई कारगर इलाज अब तक विकसित नहीं हुआ है। थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों में खून या हीमोग्लोबिन का निर्माण उम्र बढऩे के साथ और घटने लगता है। इसके अलावा शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने वाली लाल रक्त कोशिकाओं की लगातार कमी होने से शरीर में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति नहीं होने से बच्चे अक्सर बाल्यावस्था में ही दम तोड़ देते हैं।


आंकड़ों के अनुसार भारत में एक लाख से अधिक थैलेसीमिया ग्रसित बच्चे हैं जिनमें से 50 प्रतिशत बच्चे 25 वर्ष की आयु पूर्व ही मर जाते हैं। हर साल दस हजार से अधिक बच्चे थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं। आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में 5.9 प्रतिशत आदिवासियों व 1.4 प्रतिशत अनुसूचित तथा अन्य जाति के लोगों में इस बीमारी के जीन्स आज भी मौजूद हैं। यह बीमारी उन जाति-समूहों के बच्चों में ज्यादा होती हैं जिनमें एक ही गोत्र, अपने ही खून के रिश्तेदारों अथवा कुटुंब के लोगों में शादियां होती है।

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देश में तमिलनाडु ऐसा राज्य है, जहां थैलेसीमिया पीडि़त बच्चे ज्यादा पैदा होते हैं। थैलेसीमिया से पीडि़त प्रत्येक बच्चे के इलाज पर प्रति वर्ष लगभग एक लाख से अधिक खर्च आता है। इस रोग से पीडि़त बच्चे को जीवित रखने के लिए बार-बार खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। लगभग 15 हजार करोड़ इस बीमारी के रोकथाम के लिए हर साल भारत खर्च करता है। इसके बावजूद भारत में इस बीमारी की रोकथाम के लिए कोई कारगर योजना नहीं है। हालांकि, थैरेपी व बॉन मैरो ट्रांसप्लान्टेशन तकनीक से इस बीमारी का इलाज किसी हद तक तो संभव है, लेकिन यह तरीका अधिक महंगा होने के कारण सभी के लिए सुलभ नहीं हो पाता है। ऐसे में इसकी रोकथाम के लिए राष्ट्रीय नीति बनाए जाने की
जरूरत है।


थैलेसीमिया रोगियों की संख्या पर नियंत्रण के लिए आमजन में इस बीमारी के प्रति वैज्ञानिक सोच विकसित करने की भी जरूरत है। दरअसल, कई अभिभावक इलाज के लिए भोपों, बाबाओं, फकीरों, तांत्रिकों व झोलाछाप डॉक्टरों के हत्थे चढ़ जाते हैं। इसके लिए यह भी जरूरी कि इनका स्वास्थ्य कन्द्रों पर पंजीकरण सुनिश्चित होना चाहिए
- प्रो. शांतिलाल चौबीसा, जीव विज्ञानी

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