शहर में 30 हजार यूनिट खून की जरूरत हर साल, स्वैच्छिक रक्तदान 20 हजार
उज्जैन. शहर में हर साल औसत 30 हजार यूनिट ब्लड की जरूरत लगती है। इनमें से 20 हजार यूनिट की पूर्ति स्वैच्छिक रक्तदाताओं के माध्यम से हो जाती है। बाकी 10 हजार के लिए लोगों को परिजन, रिश्तेदार, मित्र व अन्य पहचान वालों की मदद लेना पड़ती है। कुछ नेगेटिव ग्रुप को छोड़कर पॉजीटिव ग्रुप वाला ब्लड सामाजिक संस्थाओं व इस क्षेत्र में काम करने वालों की मदद से मिल जाता है। सीएमएचओ कार्यालय से मिली जानकारी अनुसार बीते 4 सालों में शहर में रक्त की कमी से किसी की मौत होने जैसी घटना घटित नहीं हुई। थैलीसिमिया, कैंसर, एचआइवी, दुर्घटना में गंभीर घायल व गर्भवती महिलाओं को दूसरे ग्रुप का ब्लड लिए बगैर ब्लड बैंक से सीधे ब्लड देने के प्रावधान है। स्वैच्छिक रक्तदाताओं के जरिए एकत्रित ब्लड इन मरीजों को नि:शुल्क दिया जाता है।
शहर में ये है 4 ब्लड बैंक
शहर में 4 ब्लड बैंक पंजीकृत हैं। जिनमें जिला अस्पताल, आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज, पुष्पा मिशन हॉस्पिटल व चैरिटेबल हॉस्पिटल बुधवारिया शामिल है। इसके अलावा दर्जनभर पैथॉलॉजी है, जहां ब्लड निकालने की व्यवस्था है। लोगों को उपलब्धता अनुसार ब्लड बगैर ब्लड लिए दे दिया जाता है।
अनजानों को ब्लड दिलाने दौड़ पड़ते हैं ये युवा, अब तक 370 यूनिट दिला चुके
कर्म सेवा-धर्म सेवा संस्था बनी मिसाल, कई बार खुद के खर्च पर इंदौर तक ब्लड डोनेशन करने गए
अपने नाम को चरितार्थ करते हुए कर्म सेवा-धर्म सेवा संस्था शहर में रक्तदान की मिसाल पेश कर रही है। इसके सदस्य बगैर कोई विचार किए एक फोन पर अनजानों को ब्लड देने दौड़ पड़ते हैं। जरूरत किसी को भी है इन्हें तो मतलब है बस किसी की जिंदगी बचाने से।
साल 2014 से अब तक संस्था के जरिए 350 यूनिट रक्तदान हो चुका है। उज्जैन के नर्सिंग होम व अस्पताल को ठीक 18 बार संस्था सदस्य अपने खर्च पर इंदौर जाकर भी जिंदगी बचाने में सहभागी बन चुके हैं। रक्त की कमी से जहां देश में लाखों लोग असामयिक मृत्यु हो प्राप्त हो जाते हैं एेसे दौर में एेसी संस्थाओं की खासी जरूरत है। क्योंकि ये खून का रिश्ता सगे खून के रिश्तों से भी अहम है।
18 से 35 साल के युवाओं द्वारा बनाई गई ये संस्था नि:स्वार्थ भाव से इस सेवा अभियान में जुटी है। बस जहां से कहीं सूचना मिली और मरीज जरूरत मंद लगा ये ब्लड डोनेशन कराने में देर नहीं लगाते। संस्था संस्थापक अध्यक्ष दर्शन ठाकुर के अनुसार चार साल पहले अखबार में छपी खबर के बाद से इस काम में तन्मयता से जुटने का मन हुआ। तब एक दुर्घटनाग्रस्त बालक की खून नहीं मिलने के चलते मृत्यु हो गई थी। बस तब से भी संस्था ने ठाना की किसी घर का चिराग या किसी की जिंदगी इस कारण ना चली जाए। तब से ही युवाओं को जोड़ा और अब 120 सक्रिय रक्तदाता संस्था के पास मौजूद है। वहीं 500 से अधिक लोग सूचीबद्ध है। जो जरूरत लगने पर डोनेशन को तैयार रहते हैं।
छात्र से लेकर पुलिसकर्मी तक सदस्य
संस्था के सक्रिय रक्तदाताओं की लिस्ट में स्टूडेंट, व्यापारी, अभिभाषक, किसान से लेकर पुलिसवाले तक शामिल है, जिसको भी जहां से सूचना लगती है वे वाट्सएेप ग्रुप में शेयर करते हैं और संबंधित रक्त ग्रुप वाले से संपर्क कर डोनेशन कराया जाता है। कई बार जब ब्लड बैंकों में उपलब्धता होती है तो अन्य ग्रुप का ब्लड भी वहां डोनेट कर दिया जाता है। खुद के खर्च से इंदौर तक रक्तदान संस्था के युवाओं का जूनून काबिले तारीफ है। उज्जैन के अलावा यदि इंदौर के अस्पताल में भी ब्लड कि जरूरत का संदेश मिलता है तो युवा बाइक पर खुद के ही खर्च से वहां चले जाते हैं। अब तक 18 बार एेसा हुआ है। जब युवाओं ने इंदौर जाकर वहां किसी अनजाने को ब्लड दिया। बारिश में भी इस काम को पूरा करने से ये नहीं चूके।