शहर में यूं तो कई मंदिर हैं, लेकिन यहां एक ऐसा मंदिर भी है, जहां प्राचीन समय में हर दिन मानव बलि दी जाती थी। नवरात्रि के दौरान हम आपको एक ऐसी देवी के दर्शन कराने जा रहे हैं, जो रोज शहर में मानव की बलि लेती थी। उज्जैन में भूखी माता नाम की इस माता की कहानी सम्राट विक्रमादित्य के राजा बनने की किंवदंती जुड़ी है। मान्यता है कि भूखी माता को प्रतिदिन एक युवक की बलि दी जाती थी। राजवंश में जो भी जवान लड़के को अवंतिका नगरी का राजा घोषित किया जाता था, भूखी माता उसे खा जाती थी।
मां का विलाप देख राजा विक्रम ने दिया वचन
एक दु:खी मां का विलाप देख विक्रमादित्य ने उसे वचन दिया कि उसके बेटे की जगह वह स्वयं भूखी माता का भोग बनेगा। राजा बनते ही विक्रमादित्य ने पूरे शहर को स्वादिष्ट व खुशबू वाले व्यंजनों से सजाने का आदेश दिया। जगह-जगह छप्पन भोग सजाए गए। भूखी माता की भूख विक्रमादित्य को अपना आहार बनाने से पहले ही खत्म हो गई और उन्होंने विक्रमादित्य को प्रजा पालक चक्रवर्ती सम्राट होने का आशीर्वाद दिया। ज्योतिर्विद पं. आनंदशंकर व्यास ने बताया कि भूखी माता से राजा विक्रमादित्य ने वचन लेकर नदी के उस पार चले जाने और नगरवासियों का भक्षण नहीं करने को कहा। यहां राजा ने उनके मंदिर की स्थापना की और तभी से इस मंदिर को भूखी माता के नाम से जाना जाता है। मागर्षि शुक्ल प्रतिपदा से यहां आज भी पंद्रह दिनों तक उत्सव मेला आयोजित किया जाता है। मां के दरबार में भोग लगाकर पूजन होता है। कई लोग यहां मन्नत मांगते हैं, जो पूरी होने पर बकरे की बलि देने आज भी दूर-दूर से आते हैं।