
वाराणसी. बसपा के लिए नगर निगम चुनाव २०१७ बहुत मायने रखता है। पहली बार निकाय चुनाव में बसपा के सिंबल पर प्रत्याशी मैदान में है। बसपा ने मेयर प्रत्याशी के साथ 68 वार्ड में भी कैंडिडेट उतारे हैं, लेकिन प्रत्याशियों को पार्टी के बड़े नेताओं का साथ नहीं मिला है अब जनता ही इन लोगों के भाग्य का निर्णय करेगी।
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संसदीय चुनाव 2014 के बाद यूपी विधानसभा चुनाव 2017 बसपा के लिए बेहद खराब था। संसदीय चुनाव में बीएसपी का खाता नहीं खुला और विधानसभा में बहुमत का सपना देख रही पार्टी के 19 विधायक ही चुनाव जीत पाये हैं। इन परिस्थितियों में बसपा को फिर से अपनी ताकत दिखाने के लिए नगर निगम का चुनाव जीतना बहुत जरूरी है। सपा, कांग्रेस, बीजेपी व आप की बात की जाये तो इन दलों के राष्ट्रीय व प्रदेश स्तर के नेताओं ने अपने प्रत्याशियों के लिए चुनाव प्रचार व रोड शो किया है, लेकिन बसपा के किसी बड़े नेता ने प्रत्याशियों का चुनाव प्रचार नहीं किया, जबकि इस चुनाव का परिणाम बसपा का भविष्य तय करेगा।
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बसपा में नहीं बचे नेता कैसे करे चुनाव प्रचार
बसपा के बड़े नेताओं ने पार्टी को छोड़ दिया है। स्वामी प्रसाद मौर्या, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, ब्रजेश पाठक, इन्द्रजीत सरोज आदि नेताओं ने पार्टी छोड़ दिया है। बसपा सुप्रीमो मायावती की बात छोड़ दी जाये तो सतीश मिश्रा का ही नाम बड़े नेता के तौर पर आता है और बनारस के नगर निगम चुनाव प्रचार में सतीश मिश्रा नहीं पहुंचे।
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तो क्या गठबंधन की संजीवनी से बसपा को मिलेगी पुरानी ताकत
बसपा के नेताओं ने नगर निगम चुनाव को बहुत गंभीरता से नहीं लिया है इस बात का उदाहरण चुनाव प्रचार में बड़े नेताओं का नहीं आना है। नगर निगम चुनाव परिणाम में बसपा को कितनी सीट मिलती है यह तो समय ही बतायेगा। बसपा के पास अब गोरखपुर व फूलपुर में होने वाला उपचुनाव है इसके बाद संसदीय चुनाव 2019 में बसपा को भाग्य आजमाने का मौका मिलेगा। इस चुनाव से पहले सपा व बसपा के साथ कांग्रेस के महागठबंधन की अटकले लग रही है। मौजूदा स्थिति की बात करे तो बसपा अब गठबंधन की राजनीति के सहारे अपने पुरानी ताकत पाने का प्रयास कर सकती है। इसी बीच नगर निगम चुनाव परिणाम में बीएसपी के लिए अच्छी सूचना आ जाती है तो बसपा समर्थकों का उत्साह बढऩा तय है।
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