काशी के अस्सी घाट पर चलने वाली मां गंगा रसोई घर ने गैस की सप्लाई ना होने के कारण लकड़ी के चूल्हे पर भोजन पकाना शुरू कर दिया है। यह संस्था कोरोना काल से ही निःशुल्क लोगों का पेट भरते आ रही है....
वाराणसी: मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग के बाद पेट्रोल-डीजल और घरेलू गैस को लेकर लोगों की चिंता बढ़ गई है। इससे भारत भी अछूता नहीं रहा है। हालांकि, सरकार ने कहा है कि भारत के पास तेल और गैस का पर्याप्त स्टॉक है। वहीं, होटल्स में कॉमर्शियल गैस की सप्लाई भी बंद हो गई है। गैस खत्म होने की अफवाहों के बीच गैस के गोदाम पर ग्राहकों की लंबी कतार देखने को मिल रही है। ऐसे में काशी में नि:शुल्क भोजन करने वाली संस्था ने अब लकड़ी वाले चूल्हे की शुरुआत की है और उसे पर खाना बना कर रोज 400 गरीबों का पेट भर रही है।
कहा जाता है कि काशी में स्वयं मां अन्नपूर्णा लोगों का पेट भरती हैं और यही वजह है कि यहां कोई भूखे पेट नहीं सोता। इसको लेकर काशी की अलग-अलग संस्थाएं लोगों के बीच नि:शुल्क भोजन का वितरण करती हैं। इसी कड़ी में वाराणसी के प्रसिद्ध अस्सी घाट पर मां गंगा रसोई घर नाम से चलने वाली संस्था ने भी अब खाना बनाने का तरीका बदल दिया है। यहां प्रतिदिन करीब 400 लोगों को नि:शुल्क भोजन कराया जाता है और यह संस्था कोविड के दौरान से ही गरीबों का पेट भरते आ रही है।
संस्था के अध्यक्ष और तीर्थ पुरोहित बलराम मिश्रा ने बताया कि कोरोना काल में लोगों के रोजी रोजगार चले गए थे। इसके साथ ही कई ऐसे लोग थे जिनके सामने अपने परिवार का पेट पालना मुश्किल हो रहा था। इस दौरान हमने इस संस्था को शुरू किया था और प्रण लिया था कि काशी में किसी को भूखे पेट नहीं सोने देंगे। तब से हमारी संस्था लगातार सेवाएं देती आ रही है, लेकिन अब गैस सिलिंडर की किल्लत के कारण लकड़ी का चूल्हा जलाया गया है।
उन्होंने बताया कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के अस्पताल, गुरु धाम चौराहे के पास रहने वाले और मजदूरी करने वाले लोग, इसके साथ ही अस्सी घाट पर ऐसे लोग भी आते हैं, जिनके सामने दो वक्त की रोजी-रोटी का संकट रहता है। ऐसे में वह भूखे ना सो जाएं, इसलिए हमने गैस की किल्लत होने के बावजूद भी दूसरे तरीके से भोजन बनाने की व्यवस्था की है। उन्होंने बताया कि इस दौरान हमने गैस सिलेंडर लेने का प्रयास तो किया, लेकिन उसमें सफलता हासिल नहीं, इसके बाद हमने यह फैसला लिया है।
इसके साथ ही काशी के कई होटलों की भी तस्वीर सामने आई है, जिसमें खाना बनाने के तरीके में बदलाव किया गया है। कमर्शियल गैस सिलेंडर की आपूर्ति नहीं होने के कारण कई होटल के छतों पर मिट्टी और ईंट से चूल्हे बनाकर लकड़ी और कोयले से भोजन पकाया जा रहा है। इसके साथ ही काशी में ऐसी कई स्वयं सेवी संस्थाएं हैं, जिन्हें गैस की आपूर्ति नहीं होने के कारण कोयल या लकड़ी से खाना बनाकर जरूरतमंदों के बीच वितरित कर रही हैं।