
वाराणसी. वृद्धा की मौत के बाद बेटी व बहुओं ने मिल कर कंधा दिया था। अंतिम संस्कार करने से पहले नेत्रदान की प्रक्रिया पूर्ण करायी गयी थी। मौत के 13 दिन बाद मृत्यु भोज की शोक सभा कर मृतक की आत्मा को श्रद्धांजलि दी गयी। इसके बाद 95 फलदार पौधे लगा कर पर्यावरण बचाने का संदेश दिया।
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चिरईगांव के बरियासनपुर गांव में संतोरा देवी ने मौत के पहले ही बहुओं व बेटियों से कंधा लेने की इच्छा जतायी थी जबकि संतोरा देवी की तीन बेटे भी है। संतोरा देवी ने नेत्रदान का भी संकल्प लिया था। संतोरा देवी (95) की मौत हो जाने के बाद उनकी अंतिम इच्छा को देखते हुए नेत्रदान करने के बाद बेटी व तीन बहुओं ने कंधा दिया था। शवयात्रा में गांव की भी महिलाएं शामिल हुई थी। गांव के कुछ लोगों ने परंपरा नहीं तोडऩे की अपील की थी लेकिन मां की अंतिम इच्छा को पूर्ण करने के लिए बेटी व बहुओं ने ही कंधा दिया था। इस घटना की सभी तरह चर्चा हुई थी। वृद्धा के मृत्युभोज के समय भी मान्यताओं से हट कर व्यवस्था की गयी। मृत्युभोज देने की जगह शोकसभा का आयोजन हुआ। शोक सभा मे ंसभी लोगों ने मृतक के आत्मा की श्रद्धांजलि की प्रार्थना की। इसके बाद संतोरा देवी की आयु के अनुसार कुल 95 फलदार पौधे लगाये गये। परिजनों व गांव की महिलाओं ने पौधे लगाने के साथ ही उनकी देखभाल का भी संकल्प लिया है। फलदार पौधों से पर्यावरण की रक्षा होगी। साथ ही जब यह पौधे बड़े जो जायेंगे तो सभी को खाने के लिए फल मिलेंगे। इन वृक्षों के साथ संतोरा देवी भी लोगों के जेहन में हमेशा जिंदा रहेगी। जबकि मृत्युभोज के बाद लोग मृतक को भूल जाते हैं। संतोरा देवी की इच्छा पूर्ति करके परिवार ने अनोखा संदेश दिया है। अपने जीवनकाल के दौरान संतोरा देवी बेटी व पर्यावरण के प्रति हमेशा सजग रहती थी और उनकी यही सोच मौत के बाद भी लोगों में जिंदा रहेगी।
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