-5 तरह की होती है यह बीमारी-लगातार टोके जाने से गहरे अवसाद में पहुंचता है रोगी-मृत्यु का कारण भी बन सकती है बीमारी
डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी
वाराणसी. मनोरोग कई तरह के होते हैं, इसमें कुछ मर्ज अति गंभीर और जानलेवा है। मनोरोग के प्रकार और उनसे बचाव के रास्तों को तलाश कर लोगों को सचेत करने का बीड़ा उठाया है पत्रिका ने। इसकी दूसरी कड़ी में बात की जा रही है OCD (ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसॉर्डर) की। वैसे तो यह बहुत कॉमन बीमारी है पर है बहुत घातक। इसमें सबसे ज्यादा खतरनाक साबित होती है दूसरे लोगों की टोका-टाकी। यह टोका-टाकी रोगी ज्यादा बढ़ने पर रोगी की जान भी जा सकती है या वह स्वयं खुद को खत्म कर सकता है। इस बीमारी के बाबत पत्रिका ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के जाने-माने मनोचिकित्सक प्रो संजय गुप्ता से बात की । प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश...
मनोचिकित्सक प्रो गुप्ता कहते हैं मनोरोग को लोग समझते नहीं है, इसे हल्के में लेते है जिसके चलते रोगी की हालत दिन ब दिन बिगड़ती जाती है और एक दिन हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि मरीज खुद को खत्म कर लेता है। इसमें सबसे घातक है ओसीडी। वह बताते हैं कि ओसीडी 5 प्रकार का होता है। वैसे यह देखने में बहुत सामान्य लगता है लेकिन होता बहुत खतरनाक है। इस ओसीडी से मशहूर सिने अभिनेत्री विद्या बालन भी पीड़ित रह चुकी हैं।
प्रो गुप्ता के अनुसार ओसीडी के प्रकार
1-चेकिंग
2-वाशर्ड्स
3- डाउट
4- काउंटर्स
5-होल्डर्स
1-चेकिंग-प्रो गुप्ता ने इन पांचों प्रकार को उदाहरण सहित समझाया। बताया कि अक्सर हम पाते हैं कि कुछ लोगों को भ्रम होता है, वो घर से निकलते समय ताला बंद करते हैं, लाइट बुझा चुके होते हैं, गैस बंद कर चुके होते हैं, फिर भी घर से निकलने और कुछ दूर जाने के बाद भी उन्हें रह-रह कर यह खयाल आता रहता है कि ताला बंद नहीं किया है। लाइट नहीं बुझाई है, गैस बद नहीं है। कभी-कभी तो वह दूसरे शहर पहुंच जाते हैं फिर भी उन्हें ऐसे खयाल आते रहते हैं। ऐसे में वो वापस लौट आते हैं। इसमें उनके नजदीकी बार-बार टोकते हैं, यह टोकना पहले तो झुंझलाहट पैदा करता है, फिर एरिटेशन होने लगता है और हालात ज्यादा बिगड़ने पर अनहोनी की आशंका भी होती है। हालांकि इसमें मरीज यह भली भांति जानता है कि जो विचार आ रहे हैं वो सही नहीं है लेकिन वह चाह कर भी अपने खयालों को रोक नहीं पाता। ऐसे में वह बार-बार अपने किए को चेक करने को लौटता है। इसमें एक तो उसका समय बर्बाद होता है दूसरे काम भी प्रभावित होता है। अगर कोई कहीं नौकरी कर रहा है तो इस चेकिंग के खयाल से उसका काम में मन नहीं लगता। यह घातक है। ऐसा हो तो मरीज को तत्काल मोचिकित्सक के पास ले जाना चाहिए।
2- वाशर्ड- इसमें मरीज को गंदगी का एहसास होता है। वह बार-बार हाथ-पैर धोता है। घर का दरवाजा भी छू लेगा तो हाथ धोने पहुंच जाएगा। बहुतेरे लोग ऐसे होते हैं कि उनके घर कोई आया तो मेहमान के जाते ही वह पूरा घर ही धोने लगते हैं। बिस्तर की चादर तुरंत हटाएंगे और उसे धुलने को डाल देंगे। यह जानते हुए कि कुछ भी गंदा नहीं हुआ है लेकिन मनोविकार के चलते वो खुद को रोक नहीं पाते। बार-बार हाथ धोने से एक स्थिति ऐसी भी आती है कि उनके हाथ कास्टिक से गलने लगते हैं।
3-डाउट- इसमें तमाम तरह की शंकाएं घर कर लेती हैं। वह इन शंकाओं के वशीभूत हो कर तरह-तरह की गतिविधियों को अंजाम देता है।
4- काउंटर्स- इस बीमारी के शिकार लोग संख्यात्मक खेल में डूब जाते हैं। कोई निश्चित संख्या को ही सही मान लेते हैं और उससे इधर-उधर होने पर उन्हें अनहोनी की आशंका होती है।
5- होल्डर्स- इसमें रोगी सब कुछ जमा करने लगता है। वह बेकार की चीजों को भी फेंकता नहीं है और अगर दूसरा कोई उसे हटा दे तो उसे अच्छा नहीं लगता। इससे कलह भी पैदा होता है। दूसरे घर में बेकार की चीजों का भंडार लग जाता है।
रोगी जो बच्चे को गोद से उतारता ही नहीं
उन्होंने एक युवा का उदाहरण दिया, बताया कि उसका इन दिनों इलाज चल रहा है, वह अपने बच्चे को खुद से अलग नहीं करना चाहता। यहां तक बच्चे को हमेशा गोद से चिपकाए रखता है। उसे डर लगता है कि बच्चा उससे दूर होगा तो उसके साथ कुछ बुरा हो जाएगा। यहां तक कि वह बच्चे को उसकी मां के पास भी नहीं जाने देता। ऐसी बीमारी 20 वर्ष की अवस्था में शुरू होती है और तकरीबन 4-5 साल के बाद ही मरीज को लेकर घर वाले मनोचिकित्सक के पास आते हैं। ऐसे में उसके इलाज में 5-10 साल लग जाते हैं। इसमें भी दवाएं दी जाती हैं। साथ ही साइको थिरेपी की जाती है। इसे एक्सपोजर एंड रिसपांस थिरेपी कहते हैं। बताया कि धीरे-धीरे रोगी ठीक हो रहा है। काफी सुधार आया है।
मंदिर के पास पहुंच कर उसे यौन क्रिया का खयाल आता है
डॉ गुप्ता ने बताया कि एक विचित्र टाइप की बीमारी होती है इस ओसीडी में जिसके तहत मरीज जब भी मंदिर या किसी पवित्र जगह जाता है या उसके करीब पहुंचता है या उसे ऐसा स्थल नजर आता है तो उसके साथ ही उसके मन में यौन क्रिया से संबंधित खयाल आने लगता है। वह करता है पूजा और अचानक मन में देवी-देवता की जगह कोई लड़की आने लगती है। ऐसे लोग मंदिर या पवित्र स्थल से भागने लगते हैं, पूजा-पाठ से दूर होने लगते हैं। मंदिर से दूर होने के चक्कर में वह अपने गंतव्य तक जाने को दूसरा रास्ता चुनते हैं जहां कोई पवित्र स्थल न हो, इसमें लंबी दूरी तय करने लगते हैं। ऐसी हालत में रोगी की सर्जरी भी करनी पड़ती है।
रोगी को न रोकें न टोकें
डॉ गुप्ता बताते हैं कि ये सभी मनोरोग है और इसके लिए रोगी को तत्काल मनोचिकित्सक के पास ले ब चाहिए। लेकिन अक्सर समाज के कुछ ज्यादा जानकार लोग ज्ञान बांटने लगते हैं, विल पावर बढाने की बात करते हैं। लेकिन समाज या घर-परिवार के लोगों द्वारा लगातार दी जाने वाली शिक्षा से हताशा बढ़ती है, हताशा निराशा में तब्दील हो जाती है जो जानलेवा भी बन जाती है। दरअसल बार-बार टोके जाने से मरीज को लगता है कि क्या वह पागल हो गया है, उसके अंदर मृत्यु का भाव भी आने लगता है और यह स्थित बढने पर वह खुद को खत्म भी कर लेता है।
कोट
"किसी व्यक्ति के व्यवहार में जैसे ही कोई परिवर्तन नजर आए जो असामान्य हो तो उसे तत्काल मनोचिकित्सक के पास ले जाएं। तमाम दवाएं आ गई हैं। साइको थिरेपी भी अब आम हो गई है। ज्यादा विकट स्थिति में सर्जरी से भी रोगी को ठीक किया जा सकता है। कभी भी मरीज को बार-बार टोकें नहीं। उस पर नाराजगी न जताएं।"- प्रो संजय गुप्ता, मनोचिकित्सक, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय