#Aakhir Kyun बनारस से गुम हुए ‘रजा बनारस’ 

सबेरे के पांच बजे हैं  फजर की नमाज पढ़कर चाय की दुकान पर बैठे नमाजियों के बीच कुछ अलग से नजर आ रहे नवाब खान के हांथ में अखबार है मगर उनकी निगाहें सड़क पर रिक्शे वाले से किराए के नाम पर नोक झोंक कर रहे पहलवान टाइम आदमी पर गड़ी हुई है उधर रिक्शे वाले के गाल पर तमाचा पड़ता है इधर नवाब अपना चाय का प्याला फेंक पहलवान को गाली देते हुए सड़क पर आ जाते हैं...

10 min read
Aug 29, 2016
banarasi
banarasi
आवेश तिवारी
वाराणसी. सबेरे के पांच बजे हैं फजर की नमाज पढ़कर चाय की दुकान पर बैठे नमाजियों के बीच कुछ अलग से नजर आ रहे नवाब खान के हांथ में अखबार है मगर उनकी निगाहें सड़क पर रिक्शे वाले से किराए के नाम पर नोक झोंक कर रहे पहलवान टाइम आदमी पर गड़ी हुई है उधर रिक्शे वाले के गाल पर तमाचा पड़ता है इधर नवाब अपना चाय का प्याला फेंक पहलवान को गाली देते हुए सड़क पर आ जाते हैं।

banaras











































उनके पीछे लकालक कुर्ता पैजामा और टोपी पहने नमाजियों की भीड़ ! खैर पहलवान मौके की नजाकत देख पूरा किराया देख आगे बढ़ जाता है उसी एक वक्त अस्सी में पप्पू की चाय की दुकान पर सिगरेट के गाढ़े कश ले रहा साधू रामदास जिसके पैर में विदेशी जूते हैं अंग्रेजों को गाली दे रहा है बातचीत में पता चलता है कि किसी अंग्रेज ने उससे फोटो खिंचाने की गुजारिश की थी जब उसने मना कर दिया तो अंग्रेज ये कहकर चला गया कि अगर अभी 100 रूपए देते तो खिंचवा लेते!

गौदौलिया से दशाश्वमेघ जाने वाली सड़क पर भीड़ पहले से बढ़ी है लेकिन उस भीड़ में बड़ी बिंदी लगाए स्लीपर पहने सहेलियों के साथ चुहुलबाजी करती महिलाएं और लाल गमछा पहने बनारसी पुरुष नहीं दीखते बनारसी अब मंदिरों और घाटों पर कम जाते हैं सिर्फ नवाब खान या रामदास ही नहीं पूरा बनारस अपनी पहचान को अपने हांथ से फिसलता देख नाराज हैं।


जैसे ही सुबह के सूरज से बनारस का सामना होता है वैसे ही समुद्र जैसी भीड़ पूरे शहर में उमड़ पड़ती है जितनी बनारस की भीड़ है उससे दोगुनी भीड़ रोज इस शहर में आती है और फिर शाम होते ही वापस जाती है 9 बजते दृबजते पूरा बनारस जाम की चपेट में आ जाता है।
बनारस शहर के बारे में कहा जाता है कि इस शहर की आत्मा को जानने वाले या जानने की इच्छा रखने वाले रिक्शे पर ही शहर की परिक्रमा करते हैं मगर बदलते वक्त में आम बनारसी जो पैदल या फिर रिक्शे पर चलना शान की बात समझता था वो भी भीड़ से उब कर वातानुकूलित चार पहिया वाहनों में घूमने लगा शहर की सड़कों पर जगह.जगह खुदे गड्ढों में रेंगती गाड़ियों की चीख यूं लगती है जैसे कोई दानव इस शहर को खाने आ गया है और एक दिन पूरा खा जाएगा ।

बिहार झारखण्ड और समूचे पूर्वी उत्तर प्रदेश का बोझ सहते दृसहते ये शहर अब थक गया है ! सिर्फ शहर नहीं थके घाटों के किनारों पर बजने वाली शहनाई भी थक गयी ठुमरी भी थक गयी चैती कजरी भाषा सब थक गए सबसे बड़ा अफ़सोस ये कि अब बनारसियत भी थक गयी है।


भाजपा के राममंदिर आन्दोलन और अयोध्याए मथुरा काशी पर हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने के आवाहन से पार्टी को क्या नफा दृनुकसान हुआ इसका विश्लेषण तो होता आया है लेकिन इसका विश्लेषण कभी नहीं हुआ कि उस आन्दोलन ने इन शहरों की आत्मा को कितना प्रभावित किया द्यसच ये है कि उस आन्दोलन के बाद से बनारस एक सांस्कृतिक नगरी से धार्मिक नगरी में तब्दील हो गया !नतीजतन किसी हिल स्टेशन की तरह यहाँ भी पर्यटन एक व्यवसाय की तरह फलने.फूलने लगा गंगा के घाटों पर बनी सैकड़ों साल पुरानी इमारतें होटल बन गयी रबड़ी मलाई पूड़ी कचौड़ी जलेबी की छोटी दुकानों की जगह समूचे शहर में बड़े और महंगा रेस्तरां खुल गए ।

माल खुल गए बनारसी पान की जगह सिगरेट और गुटखे ने ले ली वहीं बनारसी साड़ी का व्यवसाय एमहंगे चीनी धागों और भारी मशीनों के नीचे दम तोड़ता चला गया देश के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा संस्थानों में शामिल बीएचयू पर पड़ रहे बोझ का खामियाजा ये हुआ कि ये मंदिरों का शहर अस्पतालों का शहर बन गया आज शहर के हर चप्पे.चप्पे पर अस्पताल और पैथोलाजी क्लिनिक हैं शहर में बची खाली जगहों पर या तो अस्पताल बना दिए गए या अंग्रेजी माध्यम के स्कूल
बनारस के बारे में कहावत थी कि यहाँ सात वार नौ त्यौहार होते हैं यानी कि एक सप्ताह में सात त्यौहार यहाँ मनाये जाते हैं।

लेकिन अब समय के साथ.साथ तीज.त्योहारों का भी रंग फीका पड़ गया ढेला चौथ एकजरी तीज एशंखु धरा एवृद्ध काल का मेला एगाजी मियां का मेला गंगा सप्तमी बुढवा मंगल जैसे त्यौहार लोग भूल गए अब विश्वप्रसिद्ध चेतगंज की नक.कट्टिया और भरत मिलाप जैसे त्योहारों पर वो भीड़ नहीं नजर आती जो महाराजा विभूति नारायण सिंह के जीवित रहते नजर आती थी ।

गंगा से जुड़े तमाम परम्परागत त्योहारों की जगह गंगा आरती जैसे नए आयोजनों ने ले ली जिनका एक मात्र उद्देश्य पर्यटकों को आकर्षित करना था बनारास की दिवाली का तो उल्लेख जातकों में भी आया है अस्सी घाट के 74 वर्षीय अंजन अहीर बताते हैं एक वक्त था कि पूरा कार्तिक का महीना बनारस शहर और उसके आस-पास रहने वाली गरीब जनता के लिए उल्लास का अवसर लेकर आता था ।

क्योंकि कुम्हारों से लेकर भड्भुजों;लावा रेवड़ी गट्टा बनाने वाले तक के साल भर की मेहनत का दाम इस एक महीने में मिल जाता था बनारस शहर मिट्टी के खिलौनों और दियों का देश का सबसे बड़ा बाजार था रामलीला शुरू होते ही घर-घर में कुटीर द्योग खुल जाते थे लेकिन अब वक्त बदल गया है एनयी पीढ़ी के लोग न तो मिट्टी के खिलौने पसंद करते हैं न ही ख़ास देशी चीजें।

बनारस से बनारसियत के गायब होने का सबसे बड़ा प्रमाण उन अड़ीयों के गायब होने से मिलता हैॆ जिन पर कभी किशन महाराज गमछा पहन कर मिल जाते थे या फिर जिन पर कभी स्व बिस्मिल्लाह खान शहनाई के सुरों को घाट किनारे छोड़ फुर्सत के लम्हे बिताया करते थे आम बनारसी की दिनचर्या में अड़ी दुनिया के किसी भी काम से ज्यादा महत्वपूर्ण थी दरअसल ये अड़ी एक किस्म की अड्डेबाजी हुआ करती थी जो किसी चाय की या पान की दूकान के बेंचों पर लगा करती थी जिसमे तमाम बनारसी सुबह और शाम अपने शहर प्रदेश देश के साथ दृसाथ समाज की चर्चा ठेठ बनारसी अंदाज में मुंह में पान घुलाते हुए और चाय की चुस्कियों के साथ किया करते थे अगर आप बनारस के पक्के मोहाल में चले जायेंगे तो आज भी आपको कुछ ऐसी अड़ी नजर आ जाएँगी जो रात को बंद हो चुकी दूकानों के बाहर लगती है किसी भी कोने में एक चाय की दुकान और रात के दो-दो बजे तक बैठकबाजी।

जिसे बनारस की भाषा में माचा मारना कहा जाता है द्यफिर जब वो घर पहुँचता था तो उसके हाँथ में मलाई या रबड़ी का पुरवा रहा करता था पांडेपुर के लक्खन साव बताते हैं भैया अब लोग माचा नाही मारे आवन एटीवी एसिनेमा बहुत कुछ ले गयल जौन बचल रहल उ व्यस्तता और महंगाई ।

बनारसियत की एक बड़ी पहचान यहाँ के पान से जुड़ी हुयी है बहुत कम लोग ये बात जानते होंगे कि दरअसल खासियत पान के पत्ते की नहीं बनारसी जर्दे की है जिसे बड़ी तन्मयता से और विधिपूर्वक तैयार किया जाता है बनारसी सुर्ती विक्रेता अपनी दूकान पर अन्य घासलेटी सुर्ती बेचना पसन्द नहीं करेगाए वहीं बनारस का पान वाला गुटखा बेचना पसंद नहीं करेगा अगर आप लंका की प्रसिद्द गामा की पान की दूकान पर जायेंगे तो आज भी गुटखा खाने से होने वाले नुकसान के बारे में लिखी तख्ती नजर आ जाएगी ।


लेकिन ज्यादा मुनाफा एवं सस्ती और तात्कालिक उपलब्धता की वजह से पान खाने वालों ने गुटखा खाना शुरू कर दिया दरअसल गुटखे और पान के बीच समय और तहजीब का अंतर है एये अंतर नए लोग स्वीकार नहीं कर पाए द्यउधर महंगाई की मार ने बनारस के जर्दा उद्योग की कमर तोड़ दी अभी एक दशक पहले तक जहाँ अकेले शहर में पान घुलाने वाले बनारसी जर्दे के साथ 50 किलो चांदी हजम कर जाते थे वो अब घटकर 5 किलो पर आ गयी बनारस के पान वालेए जर्दा बनाने के लिए सुर्ती को पहले पानी से खूब धो लेते और सारा गर्द।

गुबार साफ कर लेने के बाद उसमें बराश छोटी इलायचीए पिपरमिंट के चूर तथा गुलाबजल मिलाकर जर्दा तैयार करते हैं। इस जर्दे में सबसे बड़ी खूबी यह है कि अधिक खा लेने पर भी चक्कर नहीं देती। लेकिन अब पान व्यवसायी महंगा जर्दा बनाने का जोखिम नहीं लेना चाहते एअधिकतर दूकानों पर डिब्बे का जर्दा मिलने लगा है आज भी बनारस के लगभग 20 हजार परिवार पान के व्यसाय से जुड़े हैं लेकिन बदलते वक्त में उनकी आर्थिक हालत दिन दृप्रतिदिन खराब होती जा रही है।


बनारस शहर की सबसे बड़ी खासियत ये रही है कि यहाँ का हर एक व्यक्ति दार्शनिक है एये दार्शनिकता सुबह घाट किनारे नहाने के बाद भांग छानने से शुरू होती थी और शाम को दूकान बढाने ; यहाँ दूकाने बंद नहीं होती एबढाई जाती हैं द्धके बाद चौक.चौराहे से घर लौटने तक नजर आती थी द्यलेकिन अब आम बनारसी देश के किसी भी अन्य नागरिक की तरह जिंदगी के दुश्वारियों से बेजार है एशहर का व्यवसाय जो पहले मौज.मस्ती के साथ किया जाता था अब प्रतिस्पर्धा से लबरेज हो गया मस्ती गायब हुई तो गीत.संगीत भी गायब हुआ दालमंडी के कोठों पर जहां एक वक्त शास्त्रीय संगीत और नृत्य की अभिनव कक्षाएं लगती थी एसन्नाटा पसरा हुआ है कथाकार और साथी अनिल यादव कहते हैं यहीं से कई मशहूर फिल्म अभिनेत्रियां और क्लासिकी गायिकायें निकलीं जिनके भव्य वर्तमान में हेठा अतीत शालीनता से विलीन हो चुका है।


यहाँ जमींदारए रईस और हुक्काम आते थे। जमींदारी और रियासतें जा चुकी थीं फिर भी कोठे की वह तहजीब गिरतीए पड़ती विद्रूपों के साथ बहुत दिन घिसटती रही। सत्तर के दशक में भयानक गरीबी और लड़कियों की तस्करी के कारण वहां भीड़ बहुत बढ़ गई।

जिन गलियों में रईसों की बग्घियां खड़ी होती थी वहां लफंगे हड़हा सराय के मशहूर चाकू लहराने लगे। लोगों के विरोध के कारण तवायफों को शहर की सीमा पर मडुवाडीह में बसा दिया गया। इस एक वक्त पूर्वी उत्तर प्रदेश में सनसनीखेज अपराधों का हब बन चुके बनारस में 80 के दशक तक हत्याएरंगदारी वसूली जैसी वारदातें बेहद कम हुआ करती थी आम बनारसी रंगबाज हुआ करता था जो हिंसा की जगह अपने शारीरिक सौष्ठव को दिखाकर और अपनी भाषा के उपयोग से ही समस्याओं का हल निकाल लेता था अब वक्त बदल गया है अपराधियों के नए.नए गिरोह शहर के लोगों को भयाक्रांत कर रहे हैं शहर के विभिन्न थानों में रंगबाजी वसूलने की धमकी से सम्बंधित औसतन आधा दर्जन मामले हर माह सामने आ रहे हैं ।

बदलते वक्त में बनारस शहर की कई परम्पराओं का भी विलोपन हो गया कहीं न कहीं से इन परम्पराओं के विलोपन में आधुनिकता के साथ.साथ गंगा का प्रदूषण और गंगा के साथ बेहद मजबूती से जुड़ी आम बनारसी की दिनचर्या का कमजोर पड़ जाना भी है पिछले तीन दशकों में कई घाट जिनसे आम बनारसी की दिनचर्या शुरू होती थी पत्थरों के जंगल में गुम हो गए बीएचयू से सटा सामने घाट का इलाका जहाँ 80 के दशक में शाम 7 बजे के बाद निकलना संभव नहीं था अब सर्वाधिक घनत्व वाला इलाका बन गया नतीजा ये हुआ कि राजा बनारस का रामनगर स्थित किला और बनारस को किले से जोड़ रही गंगा अनवरत संकरी होती चली गयी।

एउधर समूचा अस्सी घाट मटमैले नाले में तब्दील हो गया द्यआज हालत ये है कि अगर बजरी पार जाकर स्नान न किया जाए तो कोई घाट ऐसा नहीं है जिस पर गन्दगी का साम्राज्य खुली आँखों से न दिखता हो द्यशिवाला के छन्नू साव कहते हैं श् दशाश्वमेघ पर लगी भीड़ और जाम की वजह से पिछले पांच साल से हम घाट पर नहीं जा रहे एपहले रिक्शा से चले जाते थे अब पुलिस ने रास्ते बेरिकेटिंग लगा दी है छन्नू बताते हैं श्हमारी बचपन से ही बहरी अलंग;बाहर खुले मैदान में नित्यक्रिया जाने की आदत थी ।

लेकिन अब के बनारस में ये संभव नहीं है नयी पीढ़ी के बच्चों में गंगा किनारे जन्म लेने को लेकर कोई गर्व नहीं है द्यअब घाट किनारे भांग छानना और अखाड़ेबाजी करना बीते दिनों की बात हो गयी दशाश्वमेघ से मान सिंह घाट जाते वक्त गंगा किनारे बने एक अखाड़े की सीढ़ियों पर बैठे गंगा अपना पसीना सुखाते हुए बोलते हैं श्अब लड़के जिम जाना पसंद करते हैं अखाड़े नहीं आते द्यशहर के लगभग एक दर्जन बड़े अखाड़े रियाज करने वालों की कमी से बंद हो गए श्द्यगंगा कहते हैंश्लोगों को नहीं मालुम एजिम में रियाज करने वालों की देह जिम छोड़ देने पर खराब हो जाती है एजबकि अखाड़े में जाने वालों काशारीर हमेशा बुलंद रहता है ।

गलियों के शहर बनारस के अधोगति में पहुँचने की एक बड़ी वजह ये है कि इस शहर के विकास को लेकर जो भी योजनायें बनायी गयी वो अन्य शहरों में इस्तेमाल की जाने वाली योजनाओं की तरह थी दिल्ली आगराएकानपुर एइलाहाबाद की तर्ज पर बनारस का विकास संभव नहीं थी हुआ ये कि हुक्मरानों ने इसके प्राचीन स्वरुप को ही बदलने की कवायद शुरू कर दी हर के बीचो.बीच बेवकूफाना ढंग से वैसे फ्लाई ओवर बनवा दिए गए एजिन पर दिन भर में 100 लोग भी नहीं गुजरते संकरी गलियों को चौड़ा करने के नाम पर पुरानी इमारतों को ध्वस्त करने का आदेश दे दिया गया एवहीँ पूरे शहर में बहुमंजिली इमारतों के अंधाधुंध निर्माण की बेशर्म इजाजत देकर उस सुबह के सूरज के रास्ते को रोकने की कोशिश की जाने लगी जिसकी वजह से बनारस पूरी दुनिया में मशहूर था । बनारस की गलियों के बारे में कहा जाता था कि बनारस की गलियों में गर्मी के दिनों में शिमले का मजाए जाड़े में पुरी का मजा और बरसात में पहाड़ी स्थानों का मजा अनायास मिलता रहता है।


यही वजह है कि बनारसी लोग पहाड़ी स्थानों में कभी नहीं जाते। रहा गन्दगी का प्रश्नए सो कहाँ नहीं है। जिस गली में इमली के बीज बिखरे होंए समझ लें इस गली में मद्रासी रहते हैं। जिस गली में मछली महकती होए वह बंगालियों का मुहल्ला है। जिस गली में हड्डी लुढ़की होए वह मुसलमान दोस्तों का मुहल्ला है। इस प्रकार हर गली में प्रत्येक वर्ग का ष्साइनबोर्ड लटकता रहता है।

अध्ययन करनेवालों को इन साइनबोर्डों से बड़ी ष्हेल्पष् मिलती है। मदनपुराए पांडे हवेलीए सोनारपुरा आदि मुहल्लों में साड़ियाँ बनती हैं और रानीकुआँए कुंजगली आदि मुहल्लों में बिकती हैं। गोबिन्दपुराए राजादरवाज़ाए रानीकुआँए कोदई की चौकी में सोने.चाँदी का व्यवसाय होता है।

कचौड़ी गली की कचौड़ीए ठठेरी बाजार के पीतल के बर्तनए विश्वनाथ गली की चूड़ियाँए लकड़ी के खिलौने भारत में प्रसिद्ध हैं। मिश्रपोखरा स्थित जर्दे के कारखानेए लोहटिया और नखास में लोहेए लकड़ी का व्यवसाय होता है।मगर अब बनारस में वो बात नहीं रही द्यये बात सुनने में शायद अजीब लगे मगर सच है कि मुख्य बनारस जो कि पक्के मोहाल के नाम से जाना जाता है में अब बनारसी नगण्य हो गए द्ययहाँ का ठठेरी बाजार जो अपने पीतल के काम के लिए देश भर में जाना जाता था।

आज बनारसियों से पूरी तरह खाली हो गया एआज आलम ये है कि यहाँ रहने वाले लगभग 80 फीसदी लोग अपना मकान बाहर के व्यापारियों को बेचकर शहर के दूसरे हिस्से में रहने चले गए हैं द्यपीतल का सामान अब लोग नहीं खरीदते जो पुराने व्यापारी हैं उन्होंने दूसरे धंधों की और रुख कर लिया है द्यबाजार में गद्दी पर बैठे रामनिहाल बताते हैं श्अब सब बाहर के लोग आकर यहाँ बस गए एहम लोगों ने भी पीतल का काम छोड़कर रामलीला और अन्य त्योहारों के लिए कपडे बनाने का काम शुरू कर दिया श्द्यअब पक्के मोहाल की गलियों में पसरा सन्नाटा अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है

जेम्स प्रिन्सेप ने 1828.29 में पहली बार बनारस शहर की अधिकारी जनगणना कराई थी उस जनगणना के नुसार बनारस की आबादी 1 लाख 80 हजार थी एआज लगभग 180 वर्षों बाद बनारस की आबादी लगभग 35 लाख है एलेकिन ये 35 लाख लोग केवल वो हैं जो पूरी तरह से इस शहर में बस गए हैं एलाखों की जनसँख्या बनारस में अपने रोजी दृरोटी एइलाज के लिए रोज आती है और फिर धीमे धीमे हमेशा के लिए इस शहर की होकर रह जाती है ।

बनारस शहर पर पड़ रहे इस भारी दबाव की वजह उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार में कर्मनाशा के तट से लेकर पटना तक के आदमी की दुर्दशा रही है द्यरोजगारएचिकित्साएशिक्षा के अभाव से जूझ रहे लोगों के लिए बनारस एक संवेदनशील शरण.स्थली साबित तो हुआ लेकिन शहर की गति रुक गयी ।

प्रसिद्द कवि और लेखक व्योमेश शुक्ल कहते हैं श्अगर बनारस को बचाना है तो इसे एक अलग देश बना देना चाहिए !व्योमेश का मानना है कि अगर हिल स्टेशनों पर जमीन की खरीद दृफरोख्त पर रोक लगाईं जा सकती है एतो प्राचीनता के परिपोषक इस शहर के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ये कदम क्यों नहीं उठाया जा सकता घ्सच ये है कि बनारसियत और बनारस को तभी बचाया जा सकता है जब इस शहर की मुलायमियत को समझते हुए यहाँ के रहने वाले लोगों के हिसाब इसके भविष्य का खाका खींचा जाये एशहर पर पड़ रहे अपरम्पार बोझ को भी कम करने की जरुरत है एगंगा को भी बचाना जरुरी है।

Published on:
29 Aug 2016 04:39 pm