एक केंद्रीय मंत्री, एक बाहुबली और फिर खुद योगी घिर रहे अपने गढ़ में
वाराणसी. यह भाजपा के अंतर्कलह की तीन कहानियां हैं। यह संगठन और सरकार में चल रही खींचतान की आवरण कथा है। लोकसभा चुनाव की आहट जैसे-जैसे तेज हो रही है, वैसे-वैसे अंतर्कलह की बातें अब सामने आने लगी हैं। दरअसल, देश और प्रदेश की सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी में टिकट के लिए घमासान शुरू हो चुका है। सबसे अधिक घमासान इस बार उस क्षेत्र में है, जहां से कभी योगी आदित्यनाथ अजेय रहे। दूसरी कहानी आजगमगढ़ की है, जहां एक बाहुबली ने परेशानी बढ़ा रखी है और तीसरी उस क्षेत्र की जहां से एक केंद्रीय मंत्री प्रतिनिधित्व करते हैं और इस बार उनका टिकट काटने की तैयारी चल रही है।
दरअसल, गोरखपुर योगी आदित्यनाथ का गढ़ कहा जाता था, जो योगी के सीएम बनने के बाद उपचुनाव में सपा के हाथों ध्वस्त हो गया। सबसे अधिक लड़ाई इस सीट पर टिकट को लेकर है। उपचुनावों में योगी के मनमुताबिक टिकट नहीं मिलने पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। 2019 में भी कुछ ऐसी ही कहानी दोहराने वाली है। फिर से एक बार उसी व्यक्ति को टिकट देने की तैयारी चल रही है, जिसे योगी नापसंद करते हैं। ऐसे में गोरखपुर में दो खेमे खासे सक्रिय हैं। राजनीतिक जानकारों की मानें तो गोरखपुर और बस्ती मंडल में वर्तमान में भाजपा दो ध्रुवों के बीच बंट गई है। एक लॉबी ब्राह्मणों की है जो नाराज चल रही है, वहीं दूसरी लॉबी राजपूतों की जो खुलकर योगी के साथ है। जातिवाद को लेकर योगी पर बार-बार आरोप प्रत्यारोप भी होते रहे हैं। ऐसे में अगर गोरखपुर से किसी ऐसे चेहरे को टिकट मिलता है जो योगी की लिस्ट में न हो तो, नतीजे पर इसका व्यापक असर होगा। साथ ही अंदर कमरे में चल रही लड़ाई 2019 आते-आते सड़क पर भी पहुंच सकती है।
दूसरी कहानी आजमगढ़ की है। यहां एक बाहुबली भाजपा के लिए मुसीबत का सबब बना है। भाजपा में रहते हुए भी बाहुबली रमाकांत अक्सर सरकार को निशाने पर लेते हैं। कुछ माह पूर्व उनकी सपा से नजदीकियां भी बढ़ीं, लेकिन फिर हाईकमान से मिले निर्देशों के बाद वे शांत हो गए। दरअसल, रमाकांड वह नेता हैं, जिन्होंने 2014 में मुलायम सिंह यादव को कड़ी टक्कर दी थी, किसी तरह मुलायम सिंह यादव चुनाव जीते। ऐसे में अगर इस महत्वपूर्ण सीट को भाजपा को जीतना है तो उसे रमाकांत यादव की सुननी होगी, लेकिन वर्तमान स्थितियों में ऐसा होता दिख नहीं रहा। यादव बाहुल्य आजमगढ़ में रमाकांत का अच्छा जनाधार है। खासतौर पर उनकी आसपास की सीटों पर भी अच्छी पकड़ है। ऐसे में अगर यह विवाद अधिक बढ़ा तो स्थितियां कुछ और हो सकती हैं। हालांकि रमाकांत साफ कर चुके हैं कि वह भाजपा नहीं छोड़ने वाले, लेकिन सभी को पता है कि सियासी ऊंट कब किस करवट बैठ जाए किसी को नहीं पता।
तीसरी कहानी एक केंद्रीय मंत्री की है। मूलतः पूर्वांचल से आने वाले इस नेता की लॉबिंग से पार्टी परेशान है। इनपर आरोप है कि यह प्रदेश सरकार के गठबंधन के एक सहयोगी दल को भड़काने का काम कर रहे हैं। इनके संरक्षण के कारण ही सहयोगी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अक्सर सरकार को घेरते नजर आते हैं। दरअसल, यह केंद्रीय मंत्री अमित शाह को भी नापसंद हैं, लेकिन कद बड़ा होने के कारण वे कुछ नहीं कर पाते। खासकर ये मंत्री एक जाति विशेष के क्षत्रपों की अक्सर बैठक कराते हैं और एक बाहुबली को पार्टी में शामिल कराने का कई बार प्रयास कर चुके हैं। पार्टी किसी प्रकार इनका टिकट काटना चाहती है, लेकिन अगर ऐसा होगा तो निश्चित तौर पर बड़ा विवाद पैदा हो जाएगा।
अब देखना है कि भाजपा अपने अंतर्कलह से कैसे बाहर आती है। अगर उसे मिशन 2019 में उत्तर प्रदेश में पुरानी स्थिति पानी है तो इन विवादों से पहले निबटना होगा।