विदिशा

Vidisha News: ‘अम्मा, तुम अकेली नहीं हो…’, निसंतान थी रमको बाई, मुंहबोले बेटे ने निभाया हर फर्ज, नम आंखों से दी विदाई

Mother-Son Emotional Story: पति के दुनिया छोड़ जाने के बाद मुंहबोले बेटे ने रमको बाई जैन (Rambko Bai) को दिया मां का औदा। अंतिम समय तक निभाया बेटे का हर फर्ज। ग्रामीणों की भी नम हुई आंखें।
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Aug 28, 2026
rambko bai emotional story
Rambko Bai Emotional Story: निसंतान महिला को मां मानकर हेमराज ने अंतिम समय तक निभाया बेटे का फर्ज (फोटो सोर्स- Patrika)

Rambko Bai Emotional Story: कई रिश्ते ऐसे भी होते है अपनत्व, संवेदना और जिम्मेदारी से बनते है। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के ग्राम बगरोदा में ऐसी ही इंसानियत की मिसाल देखने को मिली। 85 वर्षीय रमको बाई जैन के निधन के बाद रघुवंशी परिवार ने न केवल उनका अंतिम संस्कार किया, बल्कि वर्षों से निभाते आ रहे पारिवारिक रिश्ते को आखिरी सांस तक पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाया रमको बाई निसंतान थीं।

सात साल पहले दुनिया छोड़ गए थे पति

उनके पति राजमल जैन का 4 अप्रेल 2019 को आकस्मिक निधन हो गया था। उस समय भी उनके अंतिम संस्कार सहित सामाजिक दायित्वों की जिम्मेदारी हेमराज रघुवंशी और उनके परिवार ने निभाई थी। पति के निधन के बाद रमको अकेली रह गई, लेकिन रघुवंशी परिवार ने उन्हें कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। भोजन-पानी से लेकर उनकी जरूरतों तक का ध्यान परिवार के सदस्य की तरह रखा जाता रहा।

सालों की सेवा ने रिश्ते को बनाया मजबूत

रमको बाई की देखभाल किसी एक दिन या अंतिम समय की संवेदना नहीं थी। पति के खोने के बाद से लगातार रघुवंशी परिवार उनके सुख-दुख में साथ रहा। उनकी दैनिक जरूरतों का ध्यान रखने से लेकर अंतिम समय तक साथ खड़े रहना इस रिश्ते की गहराई को बताता है। हेमराज कहते हैं कि उन्होंने रमको बाई की सेवा किसी उपकार के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्य के प्रति जिम्मेदारी समझकर की। उनके अनुसार, मानवता और समाजसेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

बचपन से था मां जैसा रिश्ता

हेमराज बताते हैं कि बचपन से ही रमको बाई का उनके परिवार से गहरा जुड़ाव था। वे उनकी गोद में खेलकर बड़े हुए। इसलिए उनके लिए वो महज गांव की बुजुर्ग महिला नहीं, बल्कि मां जैसी थीं। यही अपनापन वर्षों के साथ और गहरा होता गया। गुरुवार को रमको बाई के इस दुनिया से चले जाने की खबर मिलते ही परिवार उनके अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुट गया। हेमराज के छोटे भाई संजीव रघुवंशी ने बेटे की तरह नम आंखों से और पूरी रस्मों के साथ उन्हें विदाई दी। परिवार ने उनके आगे के सामाजिक कार्यक्रमों की जिम्मेदारी भी निभाने का संकल्प लिया है।

बेटे के अपनत्व ने बदली सोच

बगरोदा की यह घटना इसलिए भी खास है क्योंकि यह उस दौर में सामने आई है, जब कई बार अपने माने जाने वाले रिश्ते भी दूर हो जाते है। ऐसे समय में एक निसंतान बुजुर्ग महिला को वर्षों तक परिवार की तरह अपनाना और उनके चले जाने के बाद संतान की तरह अंतिम संस्कार करना समाज को यह संदेश देता है कि रिश्तों को निभाने के लिए दिल में अपनापन और और इंसानियत होना जरूरी है।

Updated on:
28 Aug 2026 12:26 pm
Published on:
28 Aug 2026 12:26 pm