खरीदारी की आदतें बदलने के लिए 'एआई शॉपिंग एजेंट' तैयार हो रहे हैं। क्या है पूरा मामला? आइए नज़र डालते हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) न सिर्फ काम के तरीके बदल रहा है, बल्कि हमारी खरीदारी की आदतों को भी नया रूप देने के लिए तैयार हो रहा है। बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियाँ अब साधारण सर्च बार से आगे बढ़कर 'एआई एजेंट' विकसित कर रही हैं। कई एआई स्टार्टअप भी 'शॉपिंग' में 'एआई एजेंट' (असिस्टेंट) की भूमिका तलाश रहे हैं, जो ग्राहकों की आदतों को पहचान कर मूल्यों की तुलना करते हुए सामान का चयन करेंगे और ऑर्डर भी कर सकेंगे। यह सब समय बचाने के नाम पर किया जाएगा। हालांकि इसके खतरे कम नहीं होंगे।
दुनियाभर की कंपनियाँ 'एआई शॉपिंग एजेंट' पर बड़ा दांव लगा रही हैं। ओपनएआई और गूगल जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने 'एजेंटिक कॉमर्स प्रोटोकॉल' (एसीपी) और 'यूनिवर्सल कॉमर्स प्रोटोकॉल' (यूसीपी) पेश किए हैं। इन्होंने वॉलमार्ट और स्ट्राइप जैसी दिग्गज कंपनियों के साथ साझेदारी भी की है। अमेरिका में यूसीपी की सफलता के बाद गूगल अब इसे भारत जैसे प्रमुख बाजारों में लाने जा रहा है।
'एआई शॉपिंग एजेंट' के खतरे भी हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसा हुआ तो एआई कंपनियों की मोनोपॉली बढ़ेगी और छोटे दुकानदारों पर पहले से मंडराता खतरा और बढ़ जाएगा। निजता के हनन का खतरा तो पहले से ही है। एआई सिर्फ सर्च हिस्ट्री नहीं, बल्कि चलने के तरीके, आवाज़ के उतार-चढ़ाव और स्क्रीन पर रुकने के समय को भी ट्रैक करता है। डेटा ब्रीच होने पर आपकी पूरी डिजिटल प्रोफाइल दांव पर लग सकती है। एआई यह जान सकता है कि आपको किसी वस्तु की कितनी सख्त जरूरत है। अगर आप जल्दी में हैं तो एआई आपके लिए कीमत बढ़ा सकता है। यानी कि एक ही उत्पाद के लिए अलग-अलग कीमतें वसूलना, जिससे आपको नुकसान हो सकता है। एआई आपको गैर-ज़रूरी सामान खरीदने पर मजबूर कर सकता है। इसके अलावा एआई निर्मित नकली रिव्यू या डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके आपको घटिया उत्पाद खरीदने के लिए उत्सुक कर सकता है।