Disillusionment: बांग्लादेश चुनाव 2026 से पहले युवाओं में गहरा असंतोष; शेख हसीना के जाने के बाद भी पुरानी पार्टियों के दबदबे और एनसीपी-जमात गठबंधन ने बदली राजनीतिक दिशा।
Uprising: बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के कार्यवाहक मुखिया मुहम्मद यूनुस (Muhammad Yunus Interim Government) की अगुवाई में देश में चुनाव हो रहे हैं। बांग्लादेश की राजनीति इस वक्त एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। 12 फरवरी को होने वाले संसदीय चुनाव(Bangladesh Election 2026 Update) केवल वोटिंग का दिन नहीं हैं, बल्कि यह उस 'जुलाई क्रांति' की अग्नि परीक्षा है जिसने शेख हसीना के 15 साल पुराने अभेद्य किले को ध्वस्त कर दिया था। हालांकि, जैसे-जैसे चुनावी सरगर्मी तेज हो रही है, 'नया बांग्लादेश' (Gen Z Political Disillusionment) का सपना देखने वाले युवाओं (जेन-जी) के चेहरे पर चमक की जगह चिंता की लकीरें गहरी होती हुई नजर आ रही हैं।
बांग्लादेश के करीब 13 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 25 प्रतिशत युवा हैं। ये वही युवा हैं, जिन्होंने ढाका विश्वविद्यालय से लेकर सड़कों तक, पुलिस की गोलियों और लाठियों का सामना किया, ताकि देश को वंशवादी और तानाशाही राजनीति से मुक्त करवाया जा सके। छात्र नेता सदमान मुजतबा रफिद जैसे हजारों युवाओं को उम्मीद थी कि हसीना के जाने के बाद एक पारदर्शी और लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम होगी, लेकिन वर्तमान परिदृश्य कुछ और ही बयां कर रहा है।
हैरानी की बात यह है कि क्रांति के महीनों बाद भी कोई नई सशक्त राजनीतिक शक्ति उभर कर सामने नहीं आई है। मैदान में फिर से वही पुराने खिलाड़ी हैं—खालिदा जिया की बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी। युवा मतदाताओं को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब विद्रोह के गर्भ से निकली नेशनल सिटिजन्स पार्टी (NCP) ने कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर लिया। इस फैसले ने एनसीपी की साख पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। डॉक्टर तसनीम जरा जैसे शिक्षित पेशेवर, जो बदलाव की उम्मीद में विदेश से लौटे थे, उन्होंने इस गठबंधन के विरोध में पार्टी छोड़ दी और अब निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ताल ठोक रही हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार भी उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पाई है। अल्पसंख्यकों (हिंदू, बौद्ध और ईसाई) के खिलाफ बढ़ती हिंसा और पत्रकारों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं ने 'लोकतंत्र की जीत' के दावों को कमजोर कर दिया है। युवाओं का एक बड़ा वर्ग मानता है कि हसीना के दौर में दमन था, तो वर्तमान में अराजकता और भीड़तंत्र (Mob Violence) का बोलबाला है।
तमाम निराशाओं के बीच राहत की बात यह है कि बांग्लादेशी युवाओं का लोकतंत्र में विश्वास अभी भी अडिग है। हालिया सर्वे बताते हैं कि 97% युवा वोट डालने के लिए उत्साहित हैं। इस बार चुनाव के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण जनमत संग्रह (Referendum) भी होना है, जिसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा (Two-term limit) और राष्ट्रपति की शक्तियों को बढ़ाने जैसे अहम संवैधानिक सुधारों पर जनता की राय ली जाएगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्रांति के बाद 'ट्रांजिशन फेज' हमेशा कठिन होता है। पुरानी पार्टियों का कैडर बेस और वित्तीय पकड़ इतनी मजबूत है कि नई पार्टियों के लिए रातों-रात उन्हें चुनौती देना लगभग असंभव है। युवाओं का मोहभंग होना इस बात का संकेत है कि वे अब केवल चेहरे नहीं, बल्कि व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन चाहते हैं।
क्या जनमत संग्रह के जरिए बांग्लादेश 'टू-टर्म' कार्यकाल की सीमा को अपनाकर भविष्य के तानाशाहों पर लगाम लगा पाएगा?
सुरक्षा व्यवस्था: क्या अंतरिम सरकार चुनाव के दौरान अल्पसंख्यकों और संवेदनशील बूथों पर हिंसा रोकने में कामयाब होगी?
निर्दलीय चेहरों का असर: क्या तसनीम जरा जैसे स्वतंत्र उम्मीदवार पुरानी पार्टियों के प्रभुत्व को चुनौती दे पाएंगे?