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JAMAAT-E-ISLAMI: बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी के सत्ता में आने से क्या बढ़ेंगी भारत की मुश्किलें ? जानिए इनसाइड स्टोरी

Bangladesh Election 2026:बांग्लादेश चुनाव 2026 से पहले जमात-ए-इस्लामी की बढ़ती ताकत ने दक्षिण एशिया की राजनीति में हलचल मचा दी है। जानिए भारत के लिए इसके क्या मायने हैं और क्या यह संगठन सत्ता की कुर्सी तक पहुंचेगा।

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Jan 21, 2026
बांग्लादेश चुनाव 2026 मैदान में जमात-ए-इस्लामी। ( फोटो: पत्रिका)

Political Shift: बांग्लादेश में आम चुनाव नजदीक (Bangladesh Election Update) हैं और देश की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर है, जहां दशकों पुराना समीकरण बदलता हुआ नजर आ रहा है। शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद जिस एक नाम की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है 'जमात-ए-इस्लामी'। यह संगठन न केवल बांग्लादेश के अंदर एक बड़ी ताकत बन कर उभरा है, बल्कि इसके उभरने से भारत की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। दरअसल जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश (Bangladesh Jamaat-e-Islami 2026) का सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली इस्लामी राजनीतिक संगठन है। इसकी जड़ें अविभाजित भारत से जुड़ी हुई हैं (India-Bangladesh Relations), जब 1941 में सैयद अबुल आला मौदूदी ने इसकी स्थापना की थी। साल 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान, इस पार्टी ने पाकिस्तान का साथ दिया था, इस वजह से बांग्लादेश बनने के बाद इस संगठन पर कई बार प्रतिबंध भी लगे।

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क्या जमात बांग्लादेश की अगली सत्तासीन पार्टी होगी ?

वर्तमान अंतरिम सरकार के दौर में जमात-ए-इस्लामी खुद को एक "अनुशासित और उदार" विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि:

संगठनात्मक मजबूती: अवामी लीग के कमजोर होने के बाद, जमात का जमीनी नेटवर्क सबसे ज्यादा सक्रिय है।

छात्र आंदोलन का साथ: हालिया विरोध प्रदर्शनों में जमात के छात्र संगठन 'छात्र शिविर' ने बड़ी भूमिका निभाई, जिससे युवाओं के बीच इसकी पैठ बढ़ गई है।

धार्मिक ध्रुवीकरण: देश के अंदर बढ़ती धार्मिक कट्टरता जमात के पक्ष में चुनावी माहौल बना सकती है।

भारत के साथ 'जमात' का कनेक्शन और चिंताएं

भारत के लिए जमात-ए-इस्लामी का उदय एक कूटनीतिक चुनौती है। इसके पीछे कई ऐतिहासिक और रणनीतिक कारण हैं:

वैचारिक विरोध: जमात-ए-इस्लामी का भारत के प्रति रुख ऐतिहासिक रूप से कड़ा रहा है। वह भारत को एक क्षेत्रीय प्रभुत्ववादी शक्ति के रूप में देखता है।

सुरक्षा का मुद्दा: भारत को डर है कि अगर जमात सत्ता में आती है या सरकार का हिस्सा बनती है, तो बांग्लादेश की धरती का भारत विरोधी उग्रवादी संगठन (जैसे पूर्वोत्तर के विद्रोही) इस्तेमाल कर सकते हैं।

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: जमात पर अक्सर कट्टरपंथी विचारधारा थोपने के आरोप लगते रहे हैं। इससे बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं, जिसका सीधा असर भारत की घरेलू राजनीति और सीमाओं पर पड़ता है।

कश्मीर और पाकिस्तान: जमात का पाकिस्तान की जमात-ए-इस्लामी के साथ वैचारिक जुड़ाव रहा है। कश्मीर मुद्दे पर भी यह संगठन अक्सर भारत विरोधी स्टैंड लेता आया है।

बदलते तेवर: क्या जमात बदल रही है ?

अहम बात यह है कि हाल के दिनों में जमात के नेताओं ने भारत के प्रति अपने सुर थोड़े नरम किए हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि वे भारत के साथ "समानता और आपसी सम्मान" के आधार पर संबंध चाहते हैं। हालांकि, भारतीय विदेश नीति के विशेषज्ञ इसे केवल एक 'रणनीतिक बदलाव' मान रहे हैं।

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में 'पॉवर शिफ्ट' का संकेत (Islamist Politics South Asia)

जमात-ए-इस्लामी का संभावित उदय दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में 'पॉवर शिफ्ट' का संकेत है। जहां एक तरफ बांग्लादेश के आम नागरिक इसे भ्रष्टाचार और तानाशाही के खिलाफ एक विकल्प मान रहे हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय समुदाय'खासकर भारत' इसे कट्टरपंथ की वापसी के रूप में देख रहा है। यह देखना अहम होगा कि क्या यह पार्टी अपने अतीत के दागों को धोकर एक लोकतांत्रिक शक्ति बन पाएगी या फिर पुराने ढर्रे पर ही चलेगी।

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