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चे ग्वेरा से कास्त्रो तक: जिस क्यूबा ने अमेरिका को चुनौती दी, आज फिर ट्रंप के दबाव में क्यों है?

8 अक्टूबर 1967 को चे ग्वेरा बोलीविया में पकड़े गए और अगले दिन उनकी हत्या कर दी गई। जानिए डॉक्टर से क्रांतिकारी बने चे ग्वेरा का सफर, फिदेल कास्त्रो के साथ क्यूबा की क्रांति और आज उसी क्यूबा पर डोनाल्ड ट्रंप के बढ़ते दबाव की पूरी कहानी, इतिहास के साथ।
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Oct 08, 2026
Che Guevara
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Cuba Revolution: 8 अक्टूबर की तारीख क्यूबा की क्रांति के इतिहास में एक अलग मायने रखती है। यही वह दिन है, जब 1967 में अर्जेंटीना में जन्मे क्रांतिकारी अर्नेस्टो 'चे' ग्वेरा बोलीविया में सरकारी सैनिकों के हाथों पकड़े गए थे। अगले दिन यानी 9 अक्टूबर को उन्हें ला हिगुएरा में गोली मार दी गई। उनकी मौत ने उन्हें खत्म नहीं किया, बल्कि दुनिया के सबसे पहचाने जाने वाले क्रांतिकारी प्रतीकों में बदल दिया।

डॉक्टर से क्रांतिकारी तक का सफर


चे ग्वेरा का जन्म 14 जून 1928 को अर्जेंटीना के रोसारियो में हुआ था। पेशे से वह डॉक्टर थे, लेकिन लैटिन अमेरिका की यात्राओं के दौरान गरीबी, असमानता और राजनीतिक संघर्षों ने उनकी सोच पर गहरा असर डाला। मेक्सिको में उनकी मुलाकात फिदेल कास्त्रो से हुई। कास्त्रो उस समय क्यूबा के तानाशाह फुल्गेंसियो बतिस्ता की सरकार को हटाने के लिए सशस्त्र आंदोलन की तैयारी कर रहे थे। चे उनके साथ जुड़ गए।

जानें डिटेल्स


1956 में कास्त्रो, चे और उनके साथियों ने ग्रानमा नौका से क्यूबा में प्रवेश किया। शुरुआती झटकों के बावजूद विद्रोही सिएरा माएस्ट्रा के पहाड़ी इलाकों में संगठित हुए। धीरे-धीरे आंदोलन मजबूत हुआ और 1 जनवरी 1959 को बतिस्ता देश छोड़कर भाग गए। क्यूबा में कास्त्रो के नेतृत्व वाली क्रांतिकारी ताकतों ने सत्ता संभाल ली। चे इस क्रांति में सिर्फ एक लड़ाके नहीं थे। जीत के बाद उन्हें कई अहम जिम्मेदारियां मिलीं। वह ला कबान्या किले के कमांडर रहे, फिर नवंबर 1959 में क्यूबा के नेशनल बैंक के अध्यक्ष बने और 1961 में उद्योग मंत्री नियुक्त किए गए। इसलिए उन्हें केवल ‘क्यूबा के रक्षा मंत्री’ कहना सही नहीं होगा।

क्यूबा से निकले, दुनिया में क्रांति का सपना देखा


क्रांति के बाद चे का लक्ष्य केवल क्यूबा तक सीमित नहीं था। वह मानते थे कि सशस्त्र क्रांति को दूसरे देशों तक पहुंचना चाहिए। 1965 में वह क्यूबा से निकल गए और पहले अफ्रीका के कांगो में विद्रोही आंदोलन के साथ जुड़े। वहां अभियान सफल नहीं हुआ। इसके बाद वह गुप्त रूप से क्यूबा लौटे और 1966 में बोलीविया पहुंचे, जहां उन्होंने एक नई गुरिल्ला मुहिम शुरू की। लेकिन बोलीविया में परिस्थितियां क्यूबा जैसी नहीं थीं। स्थानीय किसानों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और सरकारी बलों ने अमेरिकी सहायता और ट्रेनिंग के साथ चे के दस्ते पर दबाव बढ़ाया। अक्टूबर 1967 तक उनका गुरिल्ला अभियान बुरी तरह कमजोर हो चुका था।

8 अक्टूबर को गिरफ्तारी, 9 अक्टूबर को मौत


8 अक्टूबर 1967 को बोलीवियाई रेंजर्स ने युरो की खाई के इलाके में चे के दस्ते को घेर लिया। मुठभेड़ में चे घायल हुए और उन्हें जिंदा पकड़ लिया गया। उन्हें पास के ला हिगुएरा गांव के एक छोटे स्कूल भवन में रखा गया। अगले दिन बोलीवियाई सेना के उच्च अधिकारियों से उन्हें मारने का आदेश आया। 9 अक्टूबर को वहीं उन्हें गोली मार दी गई। अमेरिकी दस्तावेजों के अनुसार, उन्हें मारने का आदेश बोलीवियाई सेना के मुख्यालय से आया था। उनकी मौत के बाद भी उनकी तस्वीर और विचार दुनिया भर में क्रांतिकारी राजनीति के प्रतीक बन गए। 1997 में उनके अवशेष बोलीविया में मिले और उन्हें क्यूबा के सांता क्लारा में दोबारा दफनाया गया।

छह दशक बाद फिर दबाव में क्यूबा


आज चे ग्वेरा के क्यूबा की स्थिति फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन हवाना पर लगातार दबाव बढ़ा रहा है। सितंबर 2026 में ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र में क्यूबा को 'फेल्ड स्टेट' बताया और कहा कि उनका प्रशासन वहां मौजूदा स्थिति में बुनियादी बदलाव चाहता है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी क्यूबा में राजनीतिक और आर्थिक बदलाव की जरूरत पर जोर दिया है। हालांकि, ट्रंप ने 26 सितंबर को यह भी कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिका और क्यूबा समझौते तक पहुंच सकते हैं और सैन्य कार्रवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी। वहीं हवाना का कहना है कि अमेरिका के साथ संपर्क के चैनल खुले हैं, लेकिन फिलहाल कोई औपचारिक बातचीत नहीं चल रही है।

इस तरह 8 अक्टूबर की तारीख एक दिलचस्प ऐतिहासिक पुल बन जाती है। एक तरफ वह दिन, जब चे ग्वेरा की क्रांति का आखिरी अध्याय शुरू हुआ था, और दूसरी तरफ आज का क्यूबा, जो उसी क्रांतिकारी विरासत के बीच एक बार फिर अमेरिका के भारी राजनीतिक और आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब चे बंदूक लेकर बदलाव का सपना देख रहे थे, जबकि आज क्यूबा का संघर्ष सत्ता, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच चल रहा है।

Updated on:
08 Oct 2026 09:07 pm
Published on:
08 Oct 2026 09:07 pm