
US Iran Tensions: ईरान के साथ महीनों से जारी टकराव अब सिर्फ मिसाइलों और सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रहने वाला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान पर ऐसा आर्थिक दबाव बनाने का ऐलान किया है, जिसे उन्होंने अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई बताया है। खास बात यह है कि निशाने पर केवल ईरान नहीं होगा। जो देश, बैंक, कारोबारी या संस्थाएं उसे आर्थिक सहारा देंगी, उन्हें भी अमेरिका की कड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को ईरान के खिलाफ एक नए और बेहद आक्रामक आर्थिक अभियान की घोषणा की। उन्होंने इसे “Economic D-Day” बताते हुए कहा कि अमेरिका तेहरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की दिशा में अभूतपूर्व कदम उठाएगा। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान को किसी भी तरह की आर्थिक मदद या व्यापारिक सहारा देने वाले देशों को इसके गंभीर आर्थिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
ट्रंप के बयान में खास तौर पर वित्तीय संस्थानों, कारोबार और दूसरी आर्थिक गतिविधियों के जरिए ईरान को मिलने वाली मदद पर निशाना साधने का संकेत है। हालांकि, इस समय इस पूरे अभियान के हर व्यावहारिक कदम और प्रतिबंधों की विस्तृत सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन की अगली घोषणाएं बेहद अहम मानी जा रही हैं।
इस बार अमेरिकी चेतावनी का दायरा ईरान की सीमाओं से काफी आगे जाता दिखाई दे रहा है। ट्रंप ने कहा है कि जो देश तेहरान को किसी भी तरह की “लाइफलाइन” देते हैं, वे भी अमेरिकी आर्थिक कार्रवाई से बच नहीं पाएंगे। इसका असर उन देशों और कंपनियों पर पड़ सकता है जिनका ईरान के साथ तेल, वित्त, परिवहन या अन्य व्यापारिक संबंध है।
यानी आने वाले समय में ईरान के साथ कारोबार करना केवल व्यापारिक फैसला नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक जोखिम का सवाल भी बन सकता है। अमेरिकी प्रतिबंधों का दबाव बढ़ने पर विदेशी कंपनियों और बैंकों को यह तय करना पड़ सकता है कि वे ईरानी बाजार में बने रहें या अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था से जुड़े अपने हितों को प्राथमिकता दें।
ट्रंप का ताजा बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की कोशिशें किसी निर्णायक नतीजे तक नहीं पहुंच पाई हैं। जून में बनी अंतरिम व्यवस्था की 60 दिन की समयसीमा 17 अगस्त को खत्म हो गई, लेकिन व्यापक समझौते पर सहमति नहीं बन सकी। समझौते का उद्देश्य युद्ध को रोकना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद का समाधान तलाशना था।
ट्रंप ने बातचीत का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया है। उनका कहना है कि किसी समय फिर से वार्ता हो सकती है, लेकिन अमेरिकी मांग का केंद्रीय मुद्दा वही है। ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना।
तेहरान की ओर से भी अमेरिका के दबाव के सामने झुकने के संकेत नहीं मिल रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच मौजूदा बातचीत ठप है, जबकि ओमान की मध्यस्थता से होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन को लेकर अलग प्रयास जारी रहे हैं।
यही जलडमरूमध्य इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील आर्थिक केंद्र बन चुका है। दुनिया के ऊर्जा कारोबार के लिए यह एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से तेल आपूर्ति, शिपिंग लागत और वैश्विक बाजारों पर सीधा दबाव पड़ सकता है।
ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति की सफलता इस बात पर काफी हद तक निर्भर करेगी कि तेहरान के प्रमुख कारोबारी साझेदार किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं। चीन ईरान का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है, इसलिए अमेरिकी प्रतिबंधों का असर केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित रहने की संभावना नहीं है।
यदि वॉशिंगटन नए प्रतिबंधों को व्यापक रूप देता है और दूसरे देशों की कंपनियों को भी निशाना बनाता है, तो अमेरिका और उसके व्यापारिक साझेदारों के बीच नए तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे में ईरान संकट वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार के लिए भी बड़ी परीक्षा बन सकता है।