
Donald Trump Iran War: ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर साफ किया कि वो सीधे युद्ध का दोष अपने सिर नहीं लेना चाहते। ओहायो की चुनावी रैली में ट्रंप ने खुलकर कहा, 'इस लड़ाई की शुरुआत हमने नहीं की।' साथ ही उन्होंने ये भी जोड़ा कि ईरान की सैन्य ताकत अब पहले जैसी नहीं रही। ट्रंप के इन बयानों के बाद एक बार फिर ये बहस छिड़ गई है कि आखिर ये संघर्ष कहां जाकर रुकेगा। क्या परदे के पीछे शांति की कोई बातचीत चल रही है या हालात और बिगड़ेंगे? कई लोगों के मन में यही सवाल घूम रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान का बचाव करते हुए कहा है कि इस युद्ध की शुरुआत अमेरिका ने नहीं की। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले ओहायो के चिलिकोथ में आयोजित चुनावी रैली में उन्होंने ईरान की सैन्य ताकत को लेकर भी कई दावे किए। इस रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने मौजूदा संघर्ष को ऐसी समस्या बताया, जिसका समाधान उनके राष्ट्रपति बनने से पहले ही हो जाना चाहिए था।
ट्रंप ने कहा कि ईरान के पास अब भी मिसाइलें मौजूद हैं, लेकिन उनकी संख्या पहले से काफी कम हो गई है। उन्होंने यह भी दावा किया कि बिजली की आपूर्ति बाधित होने के कारण ईरान के ड्रोन बनाने वाले कारखानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए विस्तृत आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए गए।
इस संघर्ष की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। उस समय ओमान की मध्यस्थता में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत चल रही थी।
यह पहली बार नहीं था जब वार्ता के दौरान सैन्य कार्रवाई हुई। इससे पहले पिछले वर्ष भी बातचीत जारी रहने के दौरान ईरान की परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाया गया था। ऐसे घटनाक्रमों ने कूटनीतिक प्रयासों की विश्वसनीयता और क्षेत्र में स्थायी शांति की संभावनाओं पर सवाल खड़े किए हैं।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान के साथ शांति वार्ता का रास्ता तलाशने की कोशिश की है। यह खबर हाल ही में सामने आई। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट है कि वेंस ने ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसेन रजाई को एक पत्र भेजा, जिसमें बातचीत के ढांचे पर चर्चा करने की कोशिश हुई।
इधर ट्रंप ने इस खबर पर सवाल उठाए और कहा कि असली मकसद तो सिर्फ मेडिकल सप्लाई से जुड़ा था। अब दोनों तरफ से दावे-प्रतिदावे सामने आ रहे हैं, लेकिन अभी तक कूटनीतिक तौर पर कोई ठोस प्रगति नहीं दिखती।
परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक राहत जैसी बातें बातचीत के बड़े मुद्दे बने हुए हैं। इन पर समझौता करना दोनों देशों के लिए आसान नहीं लग रहा। ईरान पर सैन्य दबाव तो है, लेकिन शांति का रास्ता तलाशना, खासकर इलाके की स्थिरता के लिए, बहुत जरूरी है। युद्ध के चलते ऊर्जा, व्यापार और पश्चिम एशिया की सुरक्षा पर असर पड़ेगाइसकी चिंता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ रही है।
अभी सबसे बड़ा सवाल यही है क्या सैन्य टकराव के बीच कूटनीति को मौका मिलेगा, या हालात और ज्यादा खराब होंगे?