
Trump Iran War US Midterm Election Results: अमेरिका के हालिया चुनाव नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति को तगड़ा झटका दे दिया है। ईरान के खिलाफ जिस युद्ध को वह सुरक्षा के नाम पर जरूरी बताते रहे, वही अब पार्टी की हार का बड़ा कारण बन गया है। मतदाताओं में गुस्सा, बढ़ती महंगाई और ईंधन की ऊंची कीमतों ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों के चुनावी सफर को और पेचीदा बना दिया। हार के बाद ट्रंप ने साफ माना कि युद्ध ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया, पर उन्होंने अपने फैसले पर अडिग रहने की बात कही।
मध्यावधि चुनाव में मिली हार के बाद अब ट्रंप की नीतियां कटघरे में आ गई हैं। ईरान पर जारी युद्ध को लेकर खुद ट्रंप ने माना कि इसका असर पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ा। फिर भी, वह मानते हैं कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना जरूरी था, इसलिए सैन्य कार्रवाई सही है।
असल में, जनता की सबसे बड़ी चिंता आर्थिक मोर्चे पर है। बढ़ते बिल, महंगा पेट्रोल और रोजमर्रा की चीजों की कीमतें। डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों ने चुनाव प्रचार में बार-बार इन्हीं मुद्दों को सामने लाया। रॉयटर्स की रिपोर्ट बताती है कि गैस, खाने-पीने जैसी चीजों के दाम बढ़ने की वजह से रिपब्लिकन पार्टी को भारी नुकसान हुआ। खुद ट्रंप का भी मानना है कि उनकी लोकप्रियता वोट में नहीं बदल पाई। उन्होंने दावा किया कि अगर वह खुद चुनाव लड़ते, तो नतीजे शायद कुछ और होते।
शिकागो काउंसिल ऑन ग्लोबल अफेयर्स की मुखिया, लेस्ली विनजामुरी मानती हैं कि ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में युद्ध खत्म करने का वादा किया था, अमेरिका को नए झमेलों से दूर रखने का भरोसा दिया था। लेकिन सबकुछ उलटा दिख रहा है। अब लोग पूछ रहे हैं।कहीं विदेश नीति के उन्हीं फैसलों ने देश की राजनीति की जड़ें ही तो कमजोर नहीं कर दीं?
चुनावी हार के साथ अब अमेरिका-इजरायल रिश्तों पर भी बहस गर्म हो गई है। डेमोक्रेटिक सीनेटर पीटर वेल्च का कहना है कि दोनों देशों के बीच पुराने रिश्तों को गहरी चोट पहुंची है। उनकी नजर में, अब डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर अविश्वास खुलकर दिखने लगा है।
डेमोक्रेट्स की जीत के बाद जाहिर है, सत्ता का संतुलन बदल रहा है। ट्रंप ने विपक्ष से कुछ मुद्दों पर साथ काम करने की बात जरूर की, लेकिन अपनी टीम में बड़े बदलाव से साफ इंकार कर दिया। रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रंप का कहना है कि जरूरत पड़ी, तो वह फिर से सैन्य कार्रवाई का वही फैसला लेंगे। यानी चुनावी हार के बावजूद, फिलहाल ईरान नीति में कोई बदलाव नहीं दिखता।