
Donald Trump Rejects Iran Proposal: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के युद्ध खत्म करने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। ट्रंप ने कहा कि ईरान समझौता करना चाहता है क्योंकि वह बुरी तरह हार रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि वह खुद भी समझौता करना चाहते हैं लेकिन ईरान की ओर से रखा गया प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका के सामने सात दिन का रोडमैप रखा था। इसके तहत अगर अमेरिका कुछ शर्तें पूरी करता है तो ईरान एक सप्ताह के भीतर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने और सामान्य समुद्री आवाजाही शुरू करने को तैयार था।
ईरान की शर्तों में उसके बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाना, ईरानी तेल की बिक्री पर प्रतिबंधों में राहत देना, करीब 12 अरब डॉलर की फ्रीज संपत्तियां जारी करना और लेबनान व यमन समेत क्षेत्र में व्यापक युद्धविराम शामिल था। इसके बदले ईरान होर्मुज खोलता और अमेरिका के साथ अंतिम समझौते के लिए बातचीत शुरू करता।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन को लगता है कि ईरान पर आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ाकर उससे आगे और रियायतें हासिल की जा सकती हैं। अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंधों को सख्त किया है और उसकी तेल आय को निशाना बनाया है। ईरानी तेल से जुड़े कारोबार और अन्य आर्थिक गतिविधियों पर भी दबाव बढ़ाया गया है।
किंग्स कॉलेज लंदन के एसोसिएट प्रोफेसर एंड्रियास क्रिग के मुताबिक, ट्रंप का मानना है कि नाकाबंदी और आर्थिक दबाव ईरान को इतना कमजोर कर रहे हैं कि तेहरान का प्रस्ताव उसकी कमजोरी का संकेत है। वहीं नाटो डिफेंस कॉलेज के रिचर्ड वेट्ज ने कहा कि अमेरिका शायद कुछ समय और इंतजार करके बेहतर शर्तें हासिल करने की उम्मीद कर रहा है।
विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि ज्यादा दबाव की रणनीति का उल्टा असर हो सकता है। क्रिग के मुताबिक, समय केवल ईरान पर ही दबाव नहीं बढ़ाता, बल्कि अमेरिका के लिए भी ऊर्जा कीमतों, सैन्य खर्च और क्षेत्रीय सहयोगियों पर दबाव बढ़ा सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में लंबे समय तक व्यवधान से खाड़ी देशों से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होती है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान आर्थिक दबाव के बावजूद अमेरिका को बातचीत में ज्यादा कीमत चुकाने के लिए मजबूर करने की कोशिश कर सकता है।
ट्रंप के प्रस्ताव ठुकराने के बाद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने कहा कि उनका देश अब अमेरिका पर भरोसा नहीं करता। उन्होंने कहा कि पहले की बातचीत के दौरान हमले और उसके बाद प्रतिबंध लगाए गए, इसलिए तेहरान को अमेरिका की बातचीत की प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है। हालांकि ईरान की ओर से यह भी कहा गया है कि विवाद का समाधान बातचीत के जरिए ही होना चाहिए।
इस बीच कतर मध्यस्थ के तौर पर दोनों देशों के बीच संदेश पहुंचाने में भूमिका निभा रहा है। यानी ट्रंप ने ईरान का मौजूदा प्रस्ताव ठुकरा दिया है लेकिन कूटनीतिक संपर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
ईरान के साथ युद्ध और बढ़ते आर्थिक दबाव का असर अमेरिका की राजनीति पर भी पड़ सकता है। नवंबर में अमेरिका में मिडटर्म चुनाव होने हैं। अल जजीरा के मुताबिक, अगस्त के अंत में हुए रॉयटर्स/इप्सोस सर्वे में 63 फीसदी अमेरिकियों ने ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध का विरोध किया जबकि 31 फीसदी ने इसका समर्थन किया।
वहीं, बढ़ती ईंधन और परिवहन लागत भी अमेरिकी लोगों की चिंता बढ़ा सकती है। होर्मुज में लंबे समय तक तनाव रहने से तेल और गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर ट्रंप सरकार पर भी पड़ सकता है।
यानी ट्रंप को ईरान के साथ समझौते के साथ-साथ युद्ध की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक कीमत का भी सामना करना पड़ सकता है।