
Houthi rebel attack on Riyadh: यमन के अंसार अल अल्लाह यानी हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच सैन्य संघर्ष तेज हो गया है। हूतियों ने एकबार फिर सऊदी अरब की राजधानी रियाद स्थित एयरपोर्ट पर हमला किया है। पिछले हमले में 13 लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे। सऊदी पर लगातार हो रहे हमलों के कारण कई विमानन कंपनियों ने अपनी आगामी उड़ाने रद्द कर दी हैं। इधर, पूरी दुनिया उस रक्षा समझौते की ओर देख रही हैं, जिसे हाल ही में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने लागू किया है। इस समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस समझौते के हस्ताक्षर के समय सामरिक मामलों के जानकारों ने सुन्नी नेटो, मुस्लिम देशों का नाटो की संज्ञा भी दी थी, लेकिन अभी तक इस समझौते को अमल में नहीं लाया गया है और सऊदी अरब बेबस प्रतीत हो रहा है।
लगातार बदल रहे सामरिक स्थिति को लेकर जानकारों का कहना है कि मक्का समझौते की असली तस्वीर यह है कि साथ दिखने वाले तीनों देश यमन को लेकर एक राह पर नहीं हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट में जब यह बात सामने आई कि यमन में सऊदी हवाई कार्रवाई में पाकिस्तानी लड़ाकू विमान भी शामिल हैं, तो पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने कुछ ही घंटों में इसे "फर्जी और मनगढ़ंत" बताते हुए खारिज कर दिया। यह इनकार ऐसे वक्त आया, जब समझौते के तीनों साझेदार देश अक्टूबर की शुरुआत में आपात बैठक कर चुके थे और सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धताओं को तुरंत जमीन पर उतारने की बात कह चुके थे।
सामरिक मामलों के जानकारों ने कहा कि पाकिस्तान का यह रवैया नया नहीं है। 1969 में पाकिस्तानी पायलटों ने सऊदी वायुसेना के लाइटनिंग जेट उड़ाकर दक्षिण यमन के ठिकानों पर बम गिराए थे, पर तब याहया खान की सरकार ने इनकार कर दिया था। 2015 में संसद ने यमन में दखल न देने का फैसला किया, फिर भी सेना ने सीमित तैनाती की और बाद में संसद को उसकी भूमिका छोटी बताई। 2018 में एक हजार से ज्यादा जवान सऊदी भेजे गए, जबकि 1500 से अधिक पहले से वहां मौजूद थे।
इसकी दो वजहें हैं। पहली, पड़ोसी ईरान, जो हूतियों का सबसे बड़ा सरकारी समर्थक है। ईरान के सांसद मोहसिन जंगनेह ने 10 अक्टूबर को तंज कसा कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के ट्वीट भी स्टीव विटकॉफ लिखते हैं। दूसरी, इस्लामी दुनिया में सऊदी की अगुवाई को मानना और खुद को उसके लिए जरूरी साबित करना। इसीलिए पाकिस्तान सेना जमीन पर साथ देती है और सरकार बाहर तटस्थ दिखती है।
इस समझौते में शामिल तीसरा व महत्वपूर्ण देश तुर्किये ने भी साफ कर दिया है कि वह इस जंग में शामिल नहीं होगा। बीते 8 अक्टूबर को तुर्किये के विदेश मंत्री हकान फिदान ने साफ तौर पर कहा कि यह समझौता रक्षा के लिए है। लिहाजा, तुर्किये अपने सैनिक यमन में जंग के मोर्चे पर नहीं भेजेगा। तुर्किये ने अपनी मदद तकनीकी और रक्षात्मक सहयोग तक ही सीमित रखा है।
पाकिस्तान सऊदी की सुरक्षा के लिए जोखिम उठाता है, पर तुर्की का मकसद दूसरा है। अंकारा यमन को रियाद के साथ होड़ का मैदान मानता है। 2015 से वह हूती विरोधी गठबंधन का जुबानी समर्थन करता रहा, लेकिन न सैनिक भेजे, न बड़े युद्धक हथियार। वह यमन में मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ी पार्टी अल-इस्लाह के जरिए अपना असर बढ़ाना चाहता है। मक्का समझौते से तुर्की को इस्लामी नेतृत्व में हिस्सेदारी का दावा मिलता है, बिना किसी जंग में उतरे।