
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनियाभर के ग्लेशियरों तेज़ी से पिघल रहे हैं। वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी चेतावनी दे रही है कि अगर की बर्फ पूरी तरह गायब हो गई तो वर्तमान में बर्फ से ढके क्षेत्रों में 56,659 नई झीलें बन सकती हैं। यह जानकारी नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में प्रकाशित एक स्टडी पर आधारित है, जिसमें स्वीडन, अमेरिका, स्विट्रज़लैंड और नॉर्वे के वैज्ञानिकों ने उपग्रह डेटा, बर्फ की मोटाई माप और कंप्यूटर मॉडलिंग का उपयोग करके ग्लेशियरों के नीचे की ज़मीन का नक्शा तैयार किया है।
समुद्र स्तर में होगी वृद्धि
स्टडी के अनुसार ये नई झीलें कुल 40,647 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ढक लेंगी। इन झीलों में 3,138 घन किलोमीटर पानी जमा हो सकता है, जो समुद्र स्तर में 7 मिलीमीटर की ऊंचाई के बराबर है। यह पानी अस्थायी रूप से इन झीलों में रुक जाएगा, जिससे समुद्र स्तर में वृद्धि तो होगी, पर ज़्यादा नहीं। इन झीलों की औसत गहराई 77 मीटर बताई गई है।
ग्लेशियर भारी होते हैं और नीचे की चट्टानों को खोदकर गहरी खाइयां (ओवरडीपनिंग) बनाते हैं। पिघलती बर्फ का पानी इन खाइयों में भरकर झीलें बनाता है। वर्तमान में भी हिमालयी क्षेत्र में झीलों का विस्तार हो रहा है।
भारत में केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट्स बताती हैं कि हिमालयी झीलों का क्षेत्रफल बढ़ रहा है, जिससे GLOF यानी ग्लेशियरों के फटने और उसकी वजह से बाढ़ आने का जोखिम बढ़ा है। अचानक बांध टूटने से भारी बाढ़ आ सकती है, जिनसे नदियों के किनारे बसे गांवों, शहरों और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि सकारात्मक पहलू पर गौर किया जाए, तो ये झीलें पानी का भंडार बन सकती हैं, जो सिंचाई, पेयजल और पर्यटन के लिए उपयोगी हो सकती हैं। लेकिन नकारात्मक पक्ष ज़्यादा गंभीर हैं जिसमें बाढ़ का खतरा, पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव, जैव विविधता पर असर और मानव बस्तियों के लिए खतरा शामिल हैं। ग्लेशियरों के पिघलने पर आर्कटिक और एंडीज़ क्षेत्र भी प्रभावित होंगे। वैज्ञानिकों के अनुसार अगर जलवायु परिवर्तन जारी रहा तो 21वीं सदी में ग्लेशियरों का बड़ा हिस्सा गायब हो जाएगा।
एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि जोखिम वाले क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई जाए, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित की जाए और खास टीमें तैयार की जाए, जिससे खतरे को रोका जा सके। साथ ही सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को तेज़ करने की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है, जिससे इस बदलाव को प्रबंधित किया जा सके।