US experts India counter China: चीन की मैन्युफैक्चरिंग ताकत अब अमेरिका, जापान और जर्मनी को मिलाकर भी ज्यादा हो गई है। जानिए अमेरिकी विशेषज्ञ क्यों कह रहे हैं कि भारत ही चीन को जवाब दे सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हाल ही में मुलाकात की थी। इसके बाद से अमेरिका को भारत की अहमियत का पता चल गया है।
दरअसल, चीन का मैन्युफैक्चरिंग बेस अमेरिका, जापान और जर्मनी को मिलाकर भी बड़ा हो गया है। ऐसे में भारत अपने आत्मनिर्भर रक्षा अभियान से दुनिया को चौंका रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत नीति ने न सिर्फ औद्योगिक गलियारे बनाए, विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाई, बल्कि स्टार्टअप इकोसिस्टम तैयार किया है जो अब हथियार और टेक्नोलॉजी निर्यात भी कर रहा है।
दस साल पहले जहां रक्षा निर्यात सिर्फ 80 मिलियन डॉलर के आसपास था, वहीं 2029 तक 6 बिलियन डॉलर का टारगेट रखा गया है। सैकड़ों कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं और नई कंपनियां लगातार जुड़ रही हैं।
अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता अब अमेरिका, यूरोप और जापान को मिलाकर भी ज्यादा है। वाशिंगटन/बीजिंग में ट्रंप और शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात ने एक बार फिर इस असंतुलन को उजागर कर दिया।
अमेरिका-चीन आर्थिक और सुरक्षा पर निगरानी रखने वाली समिति के वाइस चेयर माइक कुइकेन और कमिश्नर लीलैंड मिलर ने 'द वायर चाइना' में लिखा कि चीन के इस दबदबे के आगे अकेले अमेरिका या यूरोप कुछ नहीं कर सकते।
उन्होंने कहा- चीन का दबदबा कम करने के लिए भारत ही एकमात्र रास्ता है। यह कोई पसंद की बात नहीं, बल्कि रणनीतिक जरूरत है।
भारत भी अपनी उत्तरी सीमा पर लगातार चीनी दबाव को अच्छी तरह समझता है। इसी खतरे को देखते हुए उसका रक्षा आधुनिकीकरण चल रहा है।
अमेरिकी विशेषज्ञों ने साफ कहा कि भारत को केंद्र में रखे बिना चीन को टक्कर देना मुश्किल है। 2023 में सीनेट मेजॉरिटी लीडर चक शूमर ने भी म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में यही बात कही थी।
अक्टूबर 2024 में दोनों देशों ने संयुक्त रिसर्च, को-डेवलपमेंट और स्टार्टअप लिंकेज का रोडमैप तैयार किया। लेकिन कागजों पर सहमति बनने के बाद भी असली टेक्नोलॉजी शेयरिंग अभी भी अटकी हुई है।
भारतीय चर्चाओं में जो चिंता जताई जा रही है कि द्विपक्षीय बैठकें बढ़ रही हैं पर असली टेक्नोलॉजी एक्सेस नहीं मिल रहा, वह जायज है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि वाशिंगटन में इरादा तो तीन साल से मजबूत है, लेकिन क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा। पुराने एक्सपोर्ट कंट्रोल नियम, जटिल खरीद प्रक्रिया और फाइनेंसिंग सिस्टम अभी भी पुरानी सोच पर टिके हैं।
दोनों देश सही दस्तावेज साइन कर चुके हैं, लेकिन असली साझेदारी के लिए अमेरिका को अपना सिस्टम बदलना होगा। हर साल की देरी चीन को और मजबूत बना रही है।
भारत की बढ़ती क्षमता और अमेरिका की रणनीतिक जरूरत दोनों को अब ठोस कदम उठाने होंगे। अगर वाशिंगटन पुरानी बाधाओं को दूर कर दे तो भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग न सिर्फ दोनों देशों को फायदा पहुंचाएगा बल्कि इंडो-पैसिफिक में संतुलन भी बनाए रखेगा।