
Ayatollah Ali Khamenei Funeral: ईरान और इराक आठ सालों तक युद्ध में आमने-सामने थे। इस युद्ध ने लाखों लोगों की जान ली और दोनों देशों की कई पीढ़ियों पर गहरे जख्म छोड़ दिए। लेकिन आज वही इराक, जहां कभी युद्ध की आग धधकती थी, अब ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम धार्मिक सम्मान का गवाह बनने जा रहा है। खामेनेई के शव को इराक के पवित्र शिया शहरों नजफ और कर्बला ले जाने की चर्चा पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोर रही है। यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति, धार्मिक प्रभाव और नए शक्ति संतुलन की कहानी भी है।
1980 से 1988 तक चला ईरान-इराक युद्ध पश्चिम एशिया के इतिहास के सबसे विनाशकारी संघर्षों में गिना जाता है। इसकी शुरुआत सितंबर 1980 में हुई, जब इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला कर दिया। इस युद्ध की सबसे बड़ी वजह 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति थी। क्रांति के बाद ईरान में शिया धार्मिक नेतृत्व सत्ता में आया, जिससे सद्दाम हुसैन को आशंका थी कि इसकी विचारधारा इराक के शिया बहुल इलाकों में भी फैल सकती है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच शत्त-अल-अरब जलमार्ग और सीमा विवाद पहले से ही तनाव का कारण बने हुए थे।
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद आयतुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी ईरान के पहले सुप्रीम लीडर बने। देश की सेना, विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अंतिम फैसले उन्हीं के हाथों में थे। उस समय ईरान के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति अबुलहसन बनीसद्र थे, जिन्होंने फरवरी 1980 में पदभार संभाला था। शुरुआती दौर में वे सेना के कमांडर-इन-चीफ भी रहे, लेकिन 1981 में खुमैनी से मतभेद बढ़ने के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया और वे फ्रांस निर्वासन में चले गए।
लगभग आठ सालों तक दोनों देशों की सेनाएं लगातार मोर्चों पर लड़ती रहीं। इस दौरान रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के आरोप लगे, कई बड़े शहर तबाह हुए और करीब दस लाख लोगों की जान चली गई। 1988 में युद्ध भले ही खत्म हो गया, लेकिन दोनों देशों के बीच अविश्वास और दुश्मनी की गहरी खाई छोड़ गया।
समय के साथ पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़े बदलाव आए। सद्दाम हुसैन का शासन समाप्त हो गया और इराक की राजनीति में ईरान समर्थक शिया दलों और संगठनों का प्रभाव लगातार बढ़ता गया। आज इराक सिर्फ ईरान का पड़ोसी देश नहीं, बल्कि उसके धार्मिक और रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र का एक अहम केंद्र माना जाता है। यही वजह है कि कभी युद्ध का मैदान रहा इराक अब ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता की अंतिम यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव बनने जा रहा है।
मंगलवार, 7 जुलाई को अयातुल्ला अली खामेनेई के शव को अंतिम संस्कार से जुड़ी धार्मिक रस्मों के लिए ईरान के प्रमुख धार्मिक शहर कोम ले जाया जाएगा। इसके बाद बुधवार, 8 जुलाई को शव को इराक के पवित्र शिया शहरों नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा, जहां विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। इन समारोहों में ईरान के क्षेत्रीय शिया नेटवर्क और सहयोगी संगठनों के प्रमुख नेताओं के शामिल होने की संभावना है। इसके बाद गुरुवार को एक और अंतिम जुलूस निकाला जाएगा और फिर उन्हें ईरान के मशहद शहर में स्थित इमाम रजा के पवित्र मकबरे के निकट सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।
नजफ और कर्बला दुनिया भर के शिया मुसलमानों के सबसे पवित्र धार्मिक केंद्र माने जाते हैं। नजफ में हजरत अली का पवित्र मज़ार है, जबकि कर्बला इमाम हुसैन की शहादत की धरती है। यही कारण है कि किसी प्रमुख शिया धार्मिक नेता के शव को इन दोनों शहरों में ले जाना केवल श्रद्धांजलि नहीं माना जाता, बल्कि उसे शिया इतिहास, शहादत और इमामों की विरासत से जोड़ने का प्रतीक भी समझा जाता है।