Diplomacy: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तीखी चेतावनी के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अमेरिका से संवाद का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि देश के अधिकारों की रक्षा करते हुए सम्मान के साथ बातचीत करना जरूरी है।
US-Iran Tension : ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अमेरिका के साथ बातचीत करने के फैसले का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने साफ कहा कि आत्मसम्मान और गरिमा के साथ संवाद करना समय की जरूरत है। देश के भीतर उठ रहे विरोध के सुरों को जवाब देते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि अगर हम बातचीत का रास्ता बंद कर देंगे, तो हमारे पास क्या विकल्प बचेगा? क्या हमें केवल आखिरी सांस तक युद्ध ही करना चाहिए ?
राष्ट्रपति पेजेशकियन ने तेहरान में एक उच्चस्तरीय बैठक को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि बातचीत का विरोध करना किसी भी तरह से समझदारी भरा कदम नहीं है। उन्होंने कहा कि ईरान कूटनीतिक रास्तों पर चलने के साथ-साथ अपने राष्ट्रीय हितों और जनता के अधिकारों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। उन्होंने देशवासियों से एकजुट रहने की अपील की और कहा कि क्षेत्रीय तनाव के इस दौर में आंतरिक एकता को बनाए रखना सबसे ज्यादा जरूरी है।
ईरान के राष्ट्रपति ने देश को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे बाहरी तत्वों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि जो ताकतें तीन दिनों में इस्लामी शासन उखाड़ फेंकने का दावा करती थीं, वे अब फूट डालो और राज करो की नीति अपना रही हैं। उन्होंने गाजा संकट का जिक्र करते हुए वैश्विक प्रतिक्रियाओं और अमेरिकी मीडिया पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीन में हो रहे अपराधों को आत्मरक्षा का नाम देकर सही ठहराया जा रहा है।
दूसरी तरफ, अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम के स्टॉक और प्रतिबंधों को लेकर गतिरोध कम होने का नाम नहीं ले रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर ईरान को सीधे शब्दों में चेतावनी दी है। ट्रंप ने लिखा कि ईरान के पास समय बहुत कम बचा है, उन्हें तुरंत कड़ा कदम उठाना होगा, अन्यथा उनके पास कुछ नहीं बचेगा।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने बातचीत शुरू करने के लिए ईरान के सामने बेहद कठिन शर्तें रखी हैं। वाशिंगटन चाहता है कि ईरान अपना 400 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम सौंपे, केवल एक परमाणु प्लांट चालू रखे और जब्त संपत्तियों पर अपना दावा छोड़ दे। इसके जवाब में तेहरान ने भी अपनी पांच शर्तें रख दी हैं। ईरान का कहना है कि जब तक लेबनान और पूरे क्षेत्र में सैन्य हमले नहीं रुकते, प्रतिबंध नहीं हटाए जाते और होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसकी संप्रभुता को स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक वह बातचीत की मेज पर नहीं लौटेगा।
इस पूरे घटनाक्रम पर वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की सख्त बयानबाजी और तेहरान की जवाबी शर्तों ने पश्चिम एशिया में कूटनीतिक राह को और अधिक पेचीदा बना दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या दोनों देश अपनी कड़ी शर्तों में कोई ढील देते हैं, या फिर यह जुबानी जंग किसी नए क्षेत्रीय संघर्ष का रूप ले लेगी। इस विवाद का एक पहलू यह भी है कि ईरान के भीतर भी बातचीत को लेकर दो धड़े बन गए हैं। राष्ट्रपति जहां कूटनीति के पक्ष में हैं, वहीं कट्टरपंथी धड़ा अमेरिका से किसी भी तरह की चर्चा का खुलकर विरोध कर रहा है। (इनपुट : ANI)