Victory: ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले की विफलता के बाद, इजरायल अब लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ भू-राजनीतिक और प्रतीकात्मक जीत की तलाश में है। वहीं, अमेरिका में ट्रंप प्रशासन को घरेलू राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिसका फायदा ईरान परमाणु समझौते में उठाना चाहता है।
Strategy: मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव के बीच भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ईरान पर सीधे हमले में मनमाफिक सफलता न मिलने के बाद इजरायल अब अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल का मौजूदा आक्रामक रुख दरअसल एक जीत हासिल करने की प्रतीकात्मक कोशिश है। ईरान के मोर्चे पर इजरायल और अमेरिका को जो रणनीतिक झटके लगे हैं, उन्हें छिपाने के लिए अब लेबनान को युद्ध का नया मैदान बनाया गया है।
अरब पर्सपेक्टिव्स इंस्टीट्यूट के संस्थापक निदेशक जैदोन अल्किनानी के मुताबिक, ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका की संयुक्त सैन्य रणनीति काफी हद तक विफल रही है। इस नाकामी का सीधा असर अब दोनों देशों की घरेलू राजनीति पर दिखने लगा है। अमेरिका और इजरायल का शुरुआती लक्ष्य ईरानी शासन को जड़ से खत्म करना और उसे पंगु बनाना था, लेकिन वे इस योजना में कामयाब नहीं हो सके। इस विफलता के कारण अब इजरायल की नेतन्याहू सरकार और अमेरिकी नेतृत्व दोनों ही गहरे राजनीतिक संकट और आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं। इजरायल के लिए अब हिजबुल्लाह को नुकसान पहुंचाना एक 'प्रतीकात्मक जीत' हासिल करने से ज्यादा कुछ नहीं है, ताकि वह अपनी जनता के सामने कोई तो बड़ी सफलता पेश कर सके।
वहीं, वाशिंगटन में भी इस बेनतीजा युद्ध को लेकर भारी राजनीतिक घमासान मचा हुआ है। अमेरिकी सांसद ईरान के खिलाफ चल रहे इस आक्रामक अभियान का अब कड़ा विरोध कर रहे हैं। अमेरिकी कांग्रेस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य शक्तियों को सीमित करने के लिए 'वॉर पॉवर्स एक्ट' का हथियार उठा लिया है। ट्रंप प्रशासन सांसदों के इस कड़े कदम और अचानक हुए भारी विरोध के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। अमेरिकी संसद में चल रही इस तीखी खींचतान ने ट्रंप सरकार की ईरान नीति और सैन्य फैसलों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दूसरी तरफ, ईरान इस पूरे घटनाक्रम को अपने लिए एक बड़े अवसर के रूप में भुना रहा है। अमेरिका के भीतर चल रही राजनीतिक गुटबाजी और ट्रंप प्रशासन पर बढ़ते घरेलू दबाव को ईरान एक 'प्रतीकात्मक उपलब्धि' के तौर पर देख रहा है। तेहरान यह भली-भांति समझता है कि वाशिंगटन में हो रहे इस भारी विरोध से कूटनीतिक मोर्चे पर उसे ही फायदा होगा। अल्किनानी का कहना है कि यह राजनीतिक अस्थिरता ईरान को नए परमाणु समझौते की मेज पर मोलभाव करने और अपनी शर्तें मनवाने की अतिरिक्त ताकत देती है।
कुल मिलाकर, मध्य पूर्व का यह संकट अब केवल सैन्य शक्ति के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और घरेलू राजनीति का जटिल अखाड़ा बन चुका है। इजरायल की लेबनान में एक प्रतीकात्मक जीत की तलाश और अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के खिलाफ उठता राजनीतिक बवंडर यह साबित करता है कि ईरान के खिलाफ छेड़ी गई यह जंग उम्मीदों के विपरीत परिणाम दे रही है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में इस बात को लेकर गहरी चिंता है कि लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल का अभियान पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है। यूरोपीय यूनियन और मध्य पूर्व के अन्य देशों ने शांति की अपील की है, जबकि विश्लेषक इसे इजरायल की हताशा का परिणाम मान रहे हैं।
अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिकी संसद पर टिकी हैं कि क्या 'वॉर पॉवर्स एक्ट' के जरिए डोनाल्ड ट्रंप के सैन्य अभियानों पर कोई ठोस लगाम लगाई जा सकेगी। इसके साथ ही, यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि क्या हिजबुल्लाह इजरायल के इस आक्रामक रुख का कोई बड़ा सैन्य जवाब देता है या नहीं।
इस पूरी तनातनी का एक बड़ा पहलू ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिकी घरेलू राजनीति में उलझने के कारण अगर वाशिंगटन का दबाव कम होता है, तो ईरान बिना किसी बड़ी रुकावट के अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को और तेज कर सकता है, जो इजरायल के लिए भविष्य में और भी बड़ा खतरा बनेगा।