
Makkah Drone Attack: मक्का की ओर बढ़ रहे ड्रोन को सऊदी एयर डिफेंस ने प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में दाखिल होने से पहले ही रोक दिया, लेकिन इस घटना ने एक महीने पुराने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को लेकर नई बहस छेड़ दी है। समझौते में तीनों देशों ने कहा था कि किसी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। ऐसे में पाकिस्तान और तुर्की की तत्काल सैन्य प्रतिक्रिया के बजाय कूटनीतिक बयान सामने आने से इस समझौते की वास्तविक कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
सऊदी अरब ने मंगलवार शाम मक्का के दक्षिण में एक ड्रोन को नष्ट करने का दावा किया। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-मलिकी के अनुसार, ड्रोन को करीब शाम 6:50 बजे इंटरसेप्ट किया गया और वह पवित्र शहर की प्रतिबंधित हवाई सीमा में प्रवेश नहीं कर सका। सऊदी पक्ष ने इसे हूती विद्रोहियों की कार्रवाई बताया है। हालांकि हूती पक्ष ने इस आरोप को खारिज किया है।
घटना इसलिए अहम है क्योंकि महज कुछ सप्ताह पहले 7 अगस्त 2026 को मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते की सार्वजनिक घोषणा में साफ कहा गया था कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर हमला माना जाएगा। इसका घोषित उद्देश्य सामूहिक प्रतिरोध क्षमता बढ़ाना और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है।
पूरी तस्वीर को केवल चुप्पी कहना सही नहीं होगा। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एकजुटता जताई है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का की घटना की कड़ी निंदा करते हुए सऊदी संप्रभुता और हरमैन शरीफैन की सुरक्षा के समर्थन की बात कही। बाद में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि ने भी सऊदी अरब के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया।
लेकिन यहां बड़ा सवाल सैन्य प्रतिक्रिया का है। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने 10 सितंबर को कहा था कि मक्का समझौता मूलतः रक्षात्मक है और हालिया सऊदी हमलों के जवाब में सैन्य कार्रवाई पर उस समय चर्चा नहीं हो रही थी। पाकिस्तान ने यह भी कहा कि समझौते को लागू करने के लिए आगे की व्यवस्थाओं में समय लगेगा।
तुर्की को लेकर भी यही अंतर दिखाई देता है। समझौते के तुरंत बाद तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कहा था कि इसकी सामूहिक रक्षा व्यवस्था तकनीकी रूप से नाटो के अनुच्छेद 5 जैसी है यानी एक सदस्य पर हमला सभी के खिलाफ हमला माना जाएगा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर घटना के बाद तत्काल संयुक्त सैन्य अभियान शुरू हो जाएगा।
मक्का डिफेंस पैक्ट यानी Makkah Joint Defence Agreement पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुआ सामूहिक रक्षा समझौता है। इसे 7 अगस्त 2026 को मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने साइन किया था।
समझौते के अनुसार, तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यानी इसका मूल विचार collective defence और एक-दूसरे के लिए सामूहिक प्रतिरोध क्षमता मजबूत करना है।
पाकिस्तान पर हमला - सऊदी और तुर्की के लिए भी सुरक्षा का सवाल
सऊदी पर हमला - पाकिस्तान और तुर्की के लिए भी सामूहिक सुरक्षा का मुद्दा
तुर्की पर हमला - पाकिस्तान और सऊदी के लिए भी सामूहिक सुरक्षा का मुद्दा
हालांकि, इसका मतलब यह अपने-आप नहीं है कि किसी भी हमले के बाद तीनों देश तुरंत एक जैसी सैन्य कार्रवाई शुरू कर देंगे। समझौते के सार्वजनिक विवरण में सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग की प्रतिबद्धता स्पष्ट है, जबकि इसके हर संभावित सैन्य परिदृश्य की विस्तृत प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं की गई है।
मक्का समझौते का पूरा आधिकारिक पाठ सार्वजनिक नहीं किया गया है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी मुख्य सिद्धांत तक सीमित है सशस्त्र हमला सामूहिक हमले के रूप में देखा जाएगा और तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाया जाएगा। विशेषज्ञ विश्लेषणों में इसी वजह से यह सवाल उठाया गया है कि संकट की स्थिति में निर्णय कौन लेगा, सैन्य सहायता किस रूप में होगी और उसे लागू करने की प्रक्रिया क्या होगी।
यानी मौजूदा घटना को समझौते के खोखला साबित होने का अंतिम प्रमाण कहना अभी जल्दबाजी होगी। ड्रोन को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही सऊदी रक्षा प्रणाली ने रोक दिया और उपलब्ध जानकारी में पाकिस्तान या तुर्की से सैन्य हस्तक्षेप की कोई घोषणा नहीं हुई है। दूसरी ओर, पाकिस्तान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह समझौते की शर्तों के अनुरूप खड़ा है।
मक्का समझौते की असली परीक्षा किसी बयान से ज्यादा उसको लागु करने की व्यवस्था में होगी। 31 अगस्त को तीनों देशों की रणनीतिक राजनीतिक एवं रक्षा समिति की पहली बैठक इस्तांबुल में हुई थी, जिससे संकेत मिलता है कि समझौते को संस्थागत रूप देने की प्रक्रिया शुरू हो चूका है।
इसलिए मक्का के पास ड्रोन घटना ने फिलहाल एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है। क्या यह समझौता तत्काल सैन्य सुरक्षा की गारंटी है या सामूहिक प्रतिरोध और दीर्घकालिक रक्षा समन्वय का ढांचा? इसका स्पष्ट जवाब तभी सामने आएगा जब समझौते की गोपनीय शर्तें और संकट की स्थिति में उसकी वास्तविक प्रतिक्रिया-व्यवस्था ज्यादा स्पष्ट होगी।