
इंसानों को फिर से चांद (Moon) पर भेजने का सपना अब सिर्फ अंतरिक्ष यात्रियों पर नहीं, बल्कि रोबोटों पर भी टिका है। अमेरिका (United States of America) की स्पेस एजेंसी नासा (NASA) ने चांद पर स्थायी मानव बेस बसाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए तीन प्राइवेट कंपनियों को कुल 590 मिलियन डॉलर, जिसकी भारतीय करेंसी में वैल्यू करीब 5,611 करोड़ रुपए है के नए कॉन्ट्रैक्ट दिए हैं। इसके तहत 2028 के अंत तक चांद पर कई अनक्रूड मिशन भेजे जाएंगे, जिनमें कोई अंतरिक्ष यात्री नहीं होगा। इनके जरिए कार्गो, सेंसर, रोवर्स और वैज्ञानिक उपकरण चंद्र सतह तक पहुंचाए जाएंगे। नासा इन अभियानों को मून बेस प्रोजेक्ट का 'फेज़ वन' मानती है।
ये मिशन नासा की कमर्शियल लूनर पेलोड सर्विसेज (सीएलपीएस) योजना का हिस्सा हैं। इसका लक्ष्य चांद पर ऐसा बुनियादी ढांचा तैयार करना है, जिसे भविष्य में वहाँ पहुंचने वाले अंतरिक्ष यात्री इस्तेमाल कर सकें। स्वायत्त रोवर्स, अनुसंधान उपकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर हार्डवेयर पहले भेजे जाएंगे, जिससे मानव मिशनों का जोखिम कम हो सके।
पहले नासा खुद लैंडर विकसित करता था, लेकिन अब इसके लिए प्राइवेट कंपनियों को कॉन्ट्रैक्ट्स दे रहा है। इससे लागत घटती है और उत्पादन तेज़ होता है। कंपनियाँ नए डिज़ाइन बनाने के बजाय अपने मौजूदा लैंडरों के उन्नत संस्करणों का उपयोग करेंगी।
इन लैंडरों के उपकरण चांद पर संसाधनों की खोज करेंगे। विशेष सेंसर यह भी जांचेंगे कि लैंडर के इंजन से निकलने वाली गैसें सतह को किस तरह प्रभावित करती हैं। ऐसी जानकारी भारी मानव मिशनों की सुरक्षित लैंडिंग की नींव बनेगी।
नासा से एस्ट्रोबोटिक को 297.9 मिलियन डॉलर का सबसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिला है। कंपनी दो लैंडर भेजेगी। उसका 'ब्लू घोस्ट' 2025 में चांद पर सुरक्षित उतरने वाला पहला प्राइवेट अंतरिक्ष यान बना था। फायरफ्लाई एयरोस्पेस को 144.2 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट मिला है। हालांकि उसका 'पेरेग्रिन' लैंडर 2024 में फ्यूल लीक के कारण चांद तक नहीं पहुंच पाया था। इंट्यूइटिव मशीन्स को 148.3 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट मिला है। कंपनी दो बार चांद तक पहुंच चुकी है, लेकिन दोनों अवसरों पर उसके लैंडर उतरने के बाद पलट गए थे।