
Nepal Flood: नेपाल में आई बाढ़ के बाद हिमालयी क्षेत्र में बदलते मौसम और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को लेकर चिंता बढ़ गई है। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का मानना है कि इस आपदा के पीछे कई कारकों की भूमिका हो सकती है। इनमें सबसे चिंताजनक संकेत यह है कि 4,000 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में जहां पहले बर्फबारी होती थी, अब वहां बारिश होने लगी है।
NDTV ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने इस साल मार्च में दो रिपोर्ट जारी की थी। जिसमें हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों की तेजी से हो रही क्षति को लेकर गंभीर चेतावनी दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर साल 2000 के बाद दोगुनी हो गई है।
ICIMOD की रिपोर्टों के अनुसार, 1975 के बाद से हिंदू कुश हिमालय के कुछ ग्लेशियरों में बर्फ की मोटाई 27 मीटर तक कम हो चुकी है। वहीं, 1990 से 2020 के बीच इस क्षेत्र के ग्लेशियरों ने अपने कुल क्षेत्रफल का करीब 12 प्रतिशत और अनुमानित बर्फ भंडार का लगभग 9 प्रतिशत खो दिया। ICIMOD ने चेतावनी दी है कि ग्लेशियरों में तेजी से हो रहा यह बदलाव आने वाले वर्षों में एशिया के जल संसाधनों पर गंभीर असर डाल सकता है।
ICIMOD के शोधकर्ता यह भी जांच कर रहे हैं कि कहीं किसी ऊंचाई वाले इलाके से आया बर्फ और चट्टानों का हिमस्खलन नेपाल की अचानक आई बाढ़ का ट्रिगर तो नहीं था। अनुमान लगाया जा रहा है कि बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टानों का मलबा लेंडे खोला में गिरा हो। यह भोटे कोशी नदी की एक सहायक नदी है। इससे अचानक बड़ी मात्रा में पानी, तलछट और विशाल चट्टानें नीचे की ओर बह निकली होंगी और फ्लैश फ्लड की स्थिति पैदा हुई होगी।
ICIMOD के अनुसार, ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर दुनिया में सबसे अधिक बर्फ हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में मौजूद है। इस क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर हैं, जो करीब 55,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।
इन ग्लेशियरों से एशिया की 10 प्रमुख नदी प्रणालियों को पानी मिलता है। इन पर अरबों लोगों की खाद्य, पेयजल, ऊर्जा और आजीविका सुरक्षा निर्भर है।
ICIMOD के मुताबिक, इन ग्लेशियरों का कम से कम 78 प्रतिशत क्षेत्र 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई के बीच स्थित है और यह ऊंचाई के साथ बढ़ रहे तापमान के प्रति बेहद संवेदनशील है।
हिमालय में बर्फ का तेजी से कम होना केवल ग्लेशियरों के सिकुड़ने का सवाल नहीं है। इससे नदियों में पानी की उपलब्धता, पहाड़ी ढलानों की स्थिरता, अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा भी प्रभावित हो सकता है।