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नेपाल की बाढ़ में उजड़ गई दुनिया, 12 साल का त्सेरिंग अब भी कर रहा है माता-पिता के लौटने का इंतजार

Nepal Flash Flood: नेपाल की विनाशकारी बाढ़ ने हजारों जिंदगियां उजाड़ दीं। काठमांडू के एक मठ में रह रहा 12 साल का त्सेरिंग आज भी अपने माता-पिता के लौटने का इंतजार कर रहा है, जबकि परिवार जानता है कि वे कभी वापस नहीं आएंगे।
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Updated: 8 Sep 2026, 11:55 AM IST
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नेपाल की बाढ़ के बाद अपने माता-पिता के लौटने का इंतजार करता 12 वर्षीय त्सेरिंग (फोटो-X/@AjayJadeja171)

Nepal Flood:नेपाल में आई तबाही ने सैकड़ों हंसते-खेलते परिवारों को पल भर में उजाड़ दिया। बाढ़ और भूस्खलन के इस भयानक मंजर के बीच काठमांडू का एक बौद्ध मठ आज सैकड़ों बेघर लोगों का सहारा बना हुआ है। इसी शिविर के एक कोने में बैठा 12 साल का मासूम त्सेरिंग टकटकी लगाए दरवाजे को देख रहा है। उसे यकीन है कि उसके माता-पिता जल्द लौटेंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि वे अब इस दुनिया में नहीं हैं।

'रोते हैं बड़े, तो वो भी रो पड़ता है'

त्सेरिंग रासुवा जिले का रहने वाला है। 26 अगस्त को जब नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर टूटा, तो आई अचानक बाढ़ में उसके माता-पिता काम्मी और फुरसांग हमेशा के लिए बह गए। त्सेरिंग को संभाल रही उसकी मौसी और दादी ने इस 12 साल के बच्चे से यह कड़वा सच छुपा रखा है। उसे कहा गया है कि सड़कें टूट जाने के कारण उसके माता-पिता जंगल में फंस गए हैं और उन्हें लौटने में एक-दो साल लग जाएंगे। मासूम इस दिलासे को सच मानकर हर दिन उनका इंतजार करता है। जब आश्रम के बड़े-बुजुर्ग रोते हैं, तो वह भी बिन समझे रोने लगता है।

520 लोगों का दर्द और मेज पर पड़ी तस्वीरें

काठमांडू के इस मठ में रासुवा के करीब 520 बेघर लोग रह रहे हैं। यहां का माहौल गमगीन है, जहां सैकड़ों जिंदगियों के आशियाने, खेत और बाजार तबाह हो चुके हैं। स्थानीय स्वयंसेवक बुजुंग, जिन्होंने खुद अपने गांव के 50 से ज्यादा परिचितों को खोया है, बताते हैं कि दिन में लोग एक-दूसरे से बात करके मन बहला लेते हैं, लेकिन रात ढलते ही हर तरफ से सिसकियों की आवाजें आने लगती हैं। मठ की एक मेज पर जब खोए हुए लोगों की तस्वीरें रखी जाती हैं, तो पूरी मेज कम पड़ जाती है।

गम के बीच खिलखिलाती मासूमियत

आपदा के इस भारी माहौल के बीच राहत शिविर में बच्चों के लिए खेलने की छोटी-सी जगह बनाई गई है। यहां फुटबॉल, टेंट और खिलौने रखे गए हैं। दिन के कुछ घंटों के लिए जब बच्चे यहां खेलते हैं, तो मठ में थोड़ी हलचल लौट आती है। कुछ देर के लिए ये मासूम भूल जाते हैं कि उनका सब कुछ छीन चुका है, लेकिन खेल खत्म होते ही वही उदासी फिर छा जाती है।

'सब कुछ शून्य हो गया, अब कहां जाएं?'

40 साल के श्याम बहादुर तामांग भी अपने परिवार के साथ इसी शिविर में दिन गुजार रहे हैं। बाढ़ ने उनके 35 साल पुराने घर और परिवार के बुजुर्गों को उनसे छीन लिया। श्याम कहते हैं कि हम मेहनत करके अपने बच्चों को पढ़ा रहे थे, जिंदगी सही चल रही थी। लेकिन अब हम बिल्कुल सड़क पर आ गए हैं। ना घर बचा है और ना ही कमाई का कोई जरिया। फिर से सब कुछ कैसे खड़ा करेंगे, कुछ समझ नहीं आ रहा।

कभी न खत्म होने वाला इंतजार

शाम ढलते ही काठमांडू शहर अपनी रफ्तार से चलने लगता है, लेकिन मठ के अंदर ठहरे इन 520 लोगों की जिंदगी जैसे ठहर सी गई है। बंक बेड पर सो रहे लोगों के पास सिर्फ चंद यादें और अपनों की तस्वीरें बची हैं। किसी को सड़कें खुलने का इंतजार है, तो किसी को नई जिंदगी शुरू होने का। और वहीं एक कोने में बैठा त्सेरिंग उन दो चेहरों का रास्ता देख रहा है, जो कभी वापस नहीं आएंगे।

Updated on:
8 Sep 2026, 11:55 AM IST
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