अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने के लिए पाकिस्तान की सहमति के बाद पाकिस्तानी पीएम शहबाज़ शरीफ ने इसके चार्टर पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं। इसके तहत पाकिस्तानी को गाज़ा में अपनी सेना तैनात करनी होगी, लेकिन ऐसा करने में पाकिस्तान के सामने एक बड़ी परेशानी है।
अमेरिका (United States Of America) के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) का 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board Of Peace) चर्चा का विषय बना हुआ है। इसकी स्थापना उन्होंने गाज़ा और अन्य जगह युद्धों को रोकने और शांति की स्थापना के लिए की थी। ट्रंप खुद इसके चेयरमैन हैं और उन्होंने कई राष्ट्राध्यक्षों को इसमें शामिल होने का निमंत्रण भेजा है। पाकिस्तान (Pakistan) समेत कई देशों ने ट्रंप का निमंत्रण स्वीकार भी कर लिया है और स्विट्ज़रलैंड (Switzerland) के दावोस (Davos) में विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum - WEF) के दौरान पाकिस्तानी पीएम शहबाज़ शरीफ (Shehbaz Sharif) ने इसके चार्टर पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं। हालांकि इसकी एक शर्त पूरी करने में पाकिस्तान के सामने एक बड़ी परेशानी है।
'बोर्ड ऑफ पीस' के तहत गाज़ा में प्रस्तावित इंटरनेशनल स्टेबलाइज़ेशन फोर्स (ISF) के तहत सदस्य देश अपनी सैन्य टुकड़ी तैनात करेंगे। इसका लक्ष्य इज़रायल-हमास युद्ध (Israel-Hamas War) के बाद गाज़ा (Gaza) में स्थिरीकरण, हमास का निरस्त्रीकरण और मानवीय सहायता सुनिश्चित करना है। हालांकि पाकिस्तान ने इसके लिए अमेरिका से स्पष्ट राजनीतिक एवं परिचालन रोडमैप की मांग की है और सेना की तैनाती के लिए समय भी मांगा है।
पाकिस्तानी पीएम शरीफ और आर्मी चीफ आसिम मुनीर (Asim Munir) ने भले ही ट्रंप के कहने पर न चाहते हुए भी गाज़ा में अपनी सेना तैनात करने पर सहमति जता दी है, लेकिन यह काम इतना आसान नहीं होने वाला। ऐसा करने के लिए पाकिस्तान के सामने एक बड़ी परेशानी है। गाज़ा में सेना तैनाती के मामले पर पाकिस्तान में घरेलू स्तर पर विरोध चल रहा है।
गाज़ा का मुद्दा पाकिस्तान के लिए कोई साधारण अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि एक भावनात्मक मुद्दा है। इस्लामिक कनेक्शन होने की वजह से पाकिस्तानी जनता शुरू से ही गाज़ा के फिलिस्तीनियों के समर्थन में रही है। ऐसे में देश की जनता और इस्लामिक राजनीतिक दल गाज़ा में पाकिस्तानी सेना की तैनाती को अमेरिका-इजराइल समर्थित योजना मानती हैं, जो फिलिस्तीनियों के खिलाफ है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की तरफ से इजराइल को एक आधिकारिक देश के तौर पर मान्यता भी नहीं दी गई है और साथ ही हमास को एक आतंकी संगठन नहीं बल्कि प्रतिरोध संगठन माना जाता है, जो फिलिस्तीन (Palestine) की आज़ादी की जंग लड़ रहा है।
पाकिस्तानी जनता और इस्लामिक राजनीतिक दल हमास के निरस्त्रीकरण और गाज़ा में सेना की तैनाती को अपने मुस्लिम भाइयों के खिलाफ कार्रवाई मानते हैं। उनका कहना है कि अगर सरकार और आर्मी चीफ ने गाज़ा में अपनी सेना भेजी, तो लोगों में गुस्सा भड़क जाएगा और देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं जिससे पाकिस्तान में अस्थिरता और तनाव बढ़ेगा। ऐसे में पाकिस्तानी सेना की गाज़ा में तैनाती देश की घरेलू परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
गौरतलब है कि इज़रायल भी नहीं चाहता कि पाकिस्तानी सेना की गाज़ा में तैनाती हो। इज़रायल ने कहा है कि गाज़ा में सेना की तैनाती के मामले में वो सिर्फ उन्हीं देशों के साथ काम करना चाहते हैं जिन पर वो भरोसा कर सकते हैं और उन्हें पाकिस्तान पर भरोसा नहीं है क्योंकि पाकिस्तान हमास समर्थक है और लंबे समय से आतंकवाद का भरण-पोषण भी करता आया है।